हालांकि मेरी राह कभी आसान नहीं रही। नृत्य सीखने के लिए मुझे हर दिन घर से मल्लेश्वरम तक की तीस किलोमीटर यात्रा करनी पड़ती थी। मेरा भविष्य नृत्य ही था, मगर मैंने पढ़ाई नहीं छोड़ी। तेरह साल में मैं दोबारा स्कूल जाने लगा। मैंने हमेशा खूब मेहनत से पढ़ाई की, क्योंकि मुझे पता था कि मेरे घर वाले मेरी फीस नहीं भर सकते। जो भी करना था, मुझे खुद से हासिल करना था। मैंने वजीफे की मदद से अर्थशास्त्र में स्नातक किया। यही नहीं, मैंने मार्शल आर्ट में भी महारत हासिल की। 2009 में मैं एक राष्ट्रीय स्तर की जिमनास्टिक प्रतियोगिता का चैंपियन बना।
अगले ही साल मैंने कर्नाटक राज्य स्तरीय जिमनास्टिक में स्वर्ण पदक जीता। जल्द ही शोहरत मेरी आदत बन गई। इंडियाज गॉट टैलेंट, कर्नाटका सुपरस्टार, एंटरटेनमेंट को खुशी करो जैसे टीवी शो में मेरा चेहरा दिखने लगा। मैं भले ही प्रसिद्ध हो चुका था, लेकिन मैंने कभी अपने अतीत से मुंह नहीं मोड़ा।
मुझे गरीबी का हर एक अनुभव हमेशा याद रहा। यही वजह रही कि समर्थ होते ही मैंने एक सहयोगी की मदद से अपना एनजीओ शुरू किया। यह एनजीओ उन जरूरतमंद, वंचित बच्चों के लिए काम करता है, जिनके अंदर किसी भी प्रकार की कला की अभिरुचि होती है। हम उन्हें ढूंढते हैं, तराशते हैं और अपनी काबिलियत साबित करने का मंच मुहैया कराते हैं। हमने यूनिसेफ के साथ मिलकर देश के दूसरे हिस्सों में भी कला की विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित की हैं।
हाल ही में मुझे खुद को साबित करने का एक और सुनहर मौका मिला है। मैंने जर्मनी के एक प्रतिष्ठित डांसिंग स्कूल की स्कॉलरशिप जीती है। इसके अंतर्गत मुझे हैम्बर्ग शहर में स्थित कंटेम्पररी स्कूल ऑफ डांस में तीन वर्षीय डिग्री कोर्स करने का अवसर प्राप्त हुआ है। निश्चित रूप से बचपन में कचरा बीनने वाले किसी पच्चीस वर्षीय भारतीय के लिए यह गौरव की बात है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।