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10 वर्ष की उम्र में स्नातक स्तर की गणित के प्रश्न करते थे हल, अनंत ज्ञाता रामानुजन की अनकही कहानी

Sun, 26 Apr 2020 06:26 PM IST
Garima Garg डॉ. राजेश कुमार ठाकुर, अमर उजाला
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रामानुजन
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आज श्रीनिवास रामानुजन की 100वीं पुण्यतिथि (26 अप्रैल 1920) है। अनंत ज्ञाता इस महामानव जिनका प्रादुर्भाव 22 दिसंबर 1887 को मद्रास के एक छोटे से गांव इरोड में एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां गणित के तेज से इनसे पहले किसी का नाता ही नहीं रहा पर आज गणित जगत में ऐसा कोई नहीं होगा जो इस महान व्यक्तित्व के संघर्ष गाथा से प्रभावित ना हुआ हो। 10 वर्ष की अल्प अवस्था में स्नातक तक के सभी गणितीय सवालों को स्वयं हल करने वाले, नामगिरी देवी के अनन्य भक्त ने अपने लिए जो स्थान बनाया वो अकल्पनीय है।

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रामानुजन की प्रासंगिकता आज कितनी है ये एक विचारणीय प्रश्न है, जिसे समझने से पूर्व मैं भारत के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु की पुस्तक में रामानुजन को लेकर उधृत एक कथन से करता हूं – रामानुजन के संक्षिप्त जीवन और मृत्यु उस समय भारत की सामाजिक परिस्थितियों का एक संकेत है, करोड़ों की जनसंख्या वाले इस देश में कितनों को शिक्षा का अवसर मिल पाता है, कितने भुखमरी के कगार पर हैं – यदि परिस्थितियां अनुकूल हो और जीवन सब के लिए अपने द्वार खोल सबको खाना, समान शिक्षा और जीवन में बढ़ने के समान अवसर प्रदान करें तो इनमे से कितने ही महान वैज्ञानिक, शिक्षा शास्त्री, इंजीनियर, उद्योगपति, लेखक, कलाकार बन नए भारत का निर्माण करने में देश की मदद करेगा।

गणित में रामानुजन को वही सम्मान प्राप्त है जो भौतिकी के क्षेत्र में आइंस्टीन और न्यूटन को प्राप्त है पर रामानुजन की ओर से प्रशासन, बौद्धिक समाज का आंखें फेर लेना; संधर्ष और उपेक्षा का दंश देश की प्रगति के लिए एक खतरा है। स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी क्या हम सबको समान शिक्षा, भोजन और समान अवसर दे पाएं हैं? शायद आज भी कितने रामानुजन टकटकी लगाये सरकार की ओर आस लगाये देख रहे हैं। एक साड़ी के दुकान में काम करने वाले गरीब पिता का ये होनहार पुत्र जिनके परिवार को दो वक्त खाना ना मिलता हो अगर वो विपरीत परिस्थितियों का सामना कर एक दीप्तमान तारा बन आसमान में सुशोभित हो जाए तो यह निश्चय ही उसकी खुद की लगन और दृढ इच्छाशक्ति का परिणाम है।
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26 अप्रैल 1920 को स्वर्ग सिधारे श्रीनिवास रामानुजन की पुण्यआत्मा आज हमें, देश की सरकारों और सिस्टम से चीख- चीखकर एक प्रश्न अवश्य पूछ रही है जो 1987 में रामानुजन जन्मशताव्दी समारोह में एक भाषण के दौरान एस रामाशेषन ने पूछा भारत में आज कितने रजिस्ट्रार, कितने उपकुलपति आज रामानुजन जैसे असफल ग्यारहवीं फेल शोधार्थी को लाख रूपये प्रतिमाह की छात्रवृति (रामानुजन को उस समय 75रु. की छात्रवृत्ति मिलती थी जो आज के 1 लाख के बराबर है) प्रदान करने का साहस कर सकते हैं या ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय जैसा साहस जो रामानुजन को बीए ( आज के पीएचडी) जैसी डिग्री प्रदान कर गौरवान्वित महसूस कर सकती हैं। भारत की आजादी के सात दशक बाद हम अंग्रेजी सत्ता को देश के प्रगति के लिए रामानुजन जैसी प्रतिभा को खोज नहीं पाने के लिए दोष नहीं दे सकते।

हमें खुद से यह प्रश्न करना आवश्यक है कि रामानुजन के प्रमेय को समझने में 1913 में भारतीय गणितज्ञ असफल रहे कि उन्हें इंग्लैंड के गणितज्ञ प्रोफेसर हार्डी की राह देखनी पड़ी, रामानुजन के शोध को आखिर विदेशों में ही ख्याति क्यों मिली, क्यों रामानुजन जैसी प्रतिभा को पोर्ट पर 30 रूपये महीने की नौकरी के लिए दर बदर ठोकर खाने की आवश्यकता पड़ती है, क्यों उनकी डायरी के लगभग 4000 प्रमेय को सिद्ध करने के लिए उनके मरणोपरांत भी जॉर्ज एंड्रूज और ब्रूस बर्न जैसे अमेरिकी गणितज्ञ की ओर टकटकी लगाने की जरूरत पड़ती है, क्यों रामानुजन के अंतिम दिनों के शोध – मोक थीटा फंक्शन को सही ठहराने के लिए प्रो केन ओनो की 2012 तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, यह अवश्य ही विचारणीय प्रश्न है।

5वीं शदी में आर्यभट्ट से लेकर 13वी सदी में माधव तक गणित के गौरवमयी इतिहास के बाद के 6 शदी तक रिक्तता को भरने का श्रेय रामानुजन को मिला पर उनकी कृति को जो सम्मान मिलना आवश्यक है उसके लिए जब उनकी पत्नी जानकीअम्मल को 50 वर्ष तक अपने पति की कास्य प्रतिमा का जब इंतजार करना पड़े और अमेरिकी गणितज्ञ के सामूहिक प्रयास से कास्य प्रतिमा उन्हें गिफ्ट किया जाए तो सरकार की उदासीनता दिखती है जो एक गणितज्ञ को समोचित सम्मान नहीं दे पा रही है।

रामानुजन की कहानी सिस्टम की उपेक्षा, गरीबी और मुफलिसी में जी रहे लाखों लोगों की कहानी है जिसे आज हार्डी जैसे कोच, साथी और हितैषी की आवश्यकता है। प्रो एंड्रूज लिखते हैं मैं आश्चर्यचकित हूं कि रामानुजन ने बिना किसी कंप्यूटर सोफ्ट्वेयर की मदद से गणित की जो पराकाष्ठा पाई वो इनकी मदद से क्या क्या कमाल दिखा पाते। इंग्लैंड में रामानुजन के प्रशिक्षक रहे लिटिलवुड तो एक कदम आगे लिखते है – रामानुजन 100 या 150 वर्ष पूर्व कितने महान होते? क्या होता अगर यूलर आज रामानुजन के संपर्क में होते। रामानुजन को स्वयंभू कहने वाले महान गणितज्ञ प्रो हार्डी लिखते है कि मैं गणितीय प्रतिभा ले लिए खुद को 25, लिटिलवुड को 30, हिल्बर्ट को 80 और रामानुजन को 100 अंक देना चाहूंगा।

रामानुजन इसलिए महान नहीं हैं कि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों से लोहा लेकर अपने लिए एक ऐसा स्थान बनाया जो विरले को प्राप्त होता है, हाइपरजियोमेट्रिक, सतत श्रेणी, मोकथीटा फंक्शन, पार्टीशन नंबर पर अपने समय से आगे जाकर खोज की पर इस कालजयी महामानव हमें सचेत कर रहा है कि शिक्षा और शोध के लिए परम्परागत डिग्री नही एक शोधप्रवृति की आवश्यकता है, शोध ही वैज्ञानिकता को जीवंत करेगा और हमे वैज्ञानिक सोच पैदा करने के लिए लाखों रामानुजन की जरूरत है जो हार्डी जैसे गुरु की तलाश में असमय दम तोड़ रहे हैं। हमे ऐसे महामानव के सम्मान के लिए किसी सिस्टम की बंदिशे नही चाहिए बस कोई प्रतिभा गुमनाम ना रहे ये हमारी साझा जिम्मेदारी है। आज नेहरु के 1946 के कथन को सच करने का समय है जिससे भारत ज्ञान विज्ञान के सभी प्रतिमानों को सम्मान दें यही सच मायने में 26 अप्रैल 1920 को परलोक गए इस महामानव के प्रति सच्ची श्रद्धांजली होगी। 1920 में असामयिक मृत्यु की गोद में सोये इस कालजयी रामानुजन को मृत्यु के बाद पंडितों ने तो मुखाग्नि देने से इसलिए इंकार कर दिया था कि समुद्री यात्रा से लौटे रामानुजन ने प्रायश्चित के लिए रामेश्वरम की यात्रा नही की। आज भी सामाजिक विभेद बिखरा पड़ा है जिसे पाटने की जरूरत है, शोधपरक शिक्षा, वैज्ञानिक चिंतन और समान शिक्षा देकर ही हम सच्चे मायने में देश की सेवा कर विश्वगुरु बन पाएंगे।

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