National Seminar: महर्षि वाल्मीकि कॉलेज ऑफ एजुकेशन में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में शिक्षा के समग्र विकास पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि विद्यालयों में मेडिटेशन रूम की स्थापना और शिक्षक-छात्र संवाद को बढ़ावा देने से शिक्षा का वातावरण अधिक सकारात्मक और प्रभावी बनेगा।
Teacher-Student Interaction: स्कूलों में मेडिटेशन रूम व लोकत्रांतिक शिक्षक छात्र संवाद हो। ऐसी पहलों से स्कूल सुरक्षित बनते हैं। रंग-रूप व सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर भेदभाव सही नहीं है। यह बातें विभिन्न वक्ताओं ने राष्ट्रीय संगोष्ठी में कही।
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डीयू से संबद्ध महर्षि वाल्मीकि कॉलेज ऑफ एजुकेशन में आठ नवंबर को शैक्षणिक संस्थानों में बाल अधिकारों पर बातचीत और प्रोत्साहनः नीतिगत परिप्रेक्ष्य और व्यवहार पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें विभिन्न वक्ताओं ने बाल अधिकारों पर अपने-अपने विचार सेवानिवृत्त प्रोफेसर अनीता रामपाल ने नव उदारवादी बदलावों की समीक्षा करते हुए स्कूलों के भीतर और लोकतंत्र को साकार करने की पैरवी की। उन्होंने कहा कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा कानून का 25 फीसदी आरक्षण गरीब बच्चों के लिए नहीं, बल्कि अमीर बच्चों के लिए है, जिससे वे सहानुभूति सीख सकें।
संगोष्ठी में स्कूलों में ढांचागत बाधाएं, विद्यार्थियों की गरिमा और परंपरागत पेडागॉजी को बाल अधिकारियों की प्राप्ति में अवरोध बताया। वाइसेज फ्रॉम द फील्ड पैनल चर्चा के दौरान सेंटर फॉर चाइल्ड अली ने बच्चों की वास्तविकताओं के अनुरूप पेडागोंजी और रेस्टोरेटिव सर्किल्स को भारत में अपनाने का सुझाव दिया। शिक्षा निदेशालय सेंट्रल एवं नई दिल्ली जिले की पूर्व उपशिक्षा निदेशक रजनी रावल ने देखभाल आधारित विद्यालय प्रणालियां विकसित करने में व्यक्तियों की परिवर्तनकारी भूमिका रेखांकित की।
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उन्होंने मेडिटेशन रूम और लोकतांत्रिक शिक्षक-छात्र संवाद जैसी पहलों का उल्लेख किया जिनसे स्कूल सभी के लिए सुरक्षित बनते हैं। संगोष्ठी का विशिष्ट व्याख्यान एमवी फाउंडेशन की संस्थापक प्रो शांता सिन्हा ने दिया।