एक अन्य पर्यावरणीय समस्या वनों की कटाई है। विश्व में प्रति वर्ष 1.1 करोड़ हेक्टेयर वन काटा जाता है। अकेले भारत में 10 लाख हेक्टेयर वन काटा जा रहा है। वनों के विनाश के कारण वन्यजीव लुप्त हो रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल में लगातार होती कमी के कारण भूमि का कटाव और रेगिस्तान का फैलाव बढ़े पैमाने पर होने लगा है।बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आज ईंधनों, कोयला और पेट्रोलियम जनित उद्योगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। अनुमानतः विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 4.5 अरब टन जीवश्म ईंधन की खपत हो रही है। जिसके फलस्वरूप कार्बन डाईऑक्साइड सहित सभी ग्रीन हाउस गैसें वायुमण्डल में पहुंच रही हैं।
लगभग 7.7 करोड़ प्रतिवर्ष की दर से बढ़ती हुई विश्व की जनसंख्या आज 35 वर्षों में दुगुनी हो रही है। अकेले भारत में ही प्रतिवर्ष 1.7 करोड़ की आबादी बढ़ रही है यानी हर साल तीन नार्वे जुड़ रहे हैं। २०वीं सदी के महज कुछ दशकों में ही दुनिया की आबादी में चौंकाने वाली वृद्धि दर्ज की गई है। सन १९०० में विश्व की आबादी 1.65 अरब थी जो 1960 में लगभग दुगुनी होकर 3.02 अरब हो गई और ऐसा अनुमान है कि 199 में आबादी ६ अरब के आँकड़े को पार कर गई है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का आकलन है कि सन 2050 तक विश्व में 9.3 अरब लोग निवास कर रहे होंगे और 2200 ईस्वी तक हम 99 अरब होकर स्थिर हो जाएँगे।
अगले 50 वर्षो में अनुमानित डेढ़ गुनी जनसंख्या वृद्धि पर्यावरण को कितना गुना नुकसान करेगी यह अनुमान से परे है। लगातार बढ़ रही जनसंख्या की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु गहन कृषि तथा औद्योगिकीकरण पर जोर ने पर्यावरण का यह हाल किया है कि जिस आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका या यूरोप में बैठी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कारखाने चला रही हैं, उन्हीं कारखानों से फैलनेवाला प्रदूषण समूची जनसंख्या को निगलने को तैयार बैठा है।
ग़रीब देशों की जनता इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं बल्कि हालात की शिकार है। विश्व में आज एक किस्म का 'पर्यावरणीय जतिभेद' पनप रहा है, जिसे देखकर भी हम मूक बने बैठे हैं। विकसित अमेरिकी देशों से इलेक्ट्रोनिक या औद्योगिक विषाक्त कचरे का 50-90%, भारत या चीन जैसे विकास–शील देशों में फेंका जाता है।
वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि पृथ्वी पर लगभग 300 लाख प्रजातियों के जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधे हैं। अभी तक इनमें से केवल 15 लाख का ही पता लगाकर उनका विवरण तैयार किया जा सका है। इनमें से 724 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और 22,530 प्रजातियाँ विलुप्त होने की स्थिति में हैं।'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया' के श्लोक उस समय रचे गए थे जब न तो वैज्ञानिक या तकनीकि चमत्कार की चकाचौंध थी और न पर्यावरण प्रदूषण का प्रकोप। 'सर्व' के सुखी और निरोग देखने की व्यापक कल्पना का तानाबाना बुनते–बुनते, आज हम इतना आगे बढ़ चले हैं कि स्वयं को ही हमेशा तनावपूर्ण और रोगग्रस्त होने की शिकायतों से घिरे हुए पाते हैं।
इसकी ज़िम्मेदारी आख़िर किसके ऊपर डाली जाए?
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