फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हमारी पृथ्वी व पर्यावरण समस्या 

विज्ञापन
SGT University - फोटो : SGT University
विज्ञापन

हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसी जगह है, जहां जीवन आज भी संभव है। लेकिन जब बात पृथ्वी को बचाने और संरक्षित करने की आती है, तो विद्वान भी बगलें झांकते नजर आते हैं। दरअसल, आज मानवजन की अज्ञानता ने हमें इस मुहाने पर ला खड़ा किया है कि अब यह समझ में नहीं आ रहा कि इसमें सुधार की शुरुआत किस तरीके से हो? 

विज्ञापन


सामान्य जीवन प्रक्रिया में जब अवरोध होता है तब पर्यावरण की समस्या जन्म लेती है। यह अवरोध प्रकृति के कुछ तत्वों के अपनी मौलिक अवस्था में न रहने और विकृत हो जाने से प्रकट होता है। प्रदूषण भी एक पर्यावरणीय समस्या है जो आज एक विश्वव्यापी समस्या बन गई है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और इंसान सब उसकी चपेट में हैं। उद्योगों और मोटरवाहनों का बढ़ता उत्सर्जन और वृक्षों की निर्मम कटाई प्रदूषण के कुछ मुख्य कारण हैं। कारखानों, बिजलीघरों और मोटरवाहनों में खनिज ईंधनों (डीजल, पेट्रोल, कोयला आदि) का अंधाधुंध प्रयोग होता है। इनको जलाने पर कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड आदि गैसें निकलती हैं। इन गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी के वायुमंडल का तापमान लगातार बढ़ रहा है।

साथ ही समुद्र का तापमान भी बढ़ने लगा है। पिछले सौ सालों में वायुमंडल का तापमान 3 से 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। लगातार बढ़ते तापमान से दोनों ध्रुवों पर बर्फ गलने लगेगी। अनुमान लगाया गया है कि इससे समुद्र का जल एक से तीन मिमी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ेगा। अगर समुद्र का जलस्तर दो मीटर बढ़ गया तो मालद्वीप और बंग्लादेश जैसे निचाईवाले देश डूब जाएंगे। इसके अलावा मौसम में बदलाव आ सकता है - कुछ क्षेत्रों में सूखा पड़ेगा तो कुछ जगहों पर तूफान आएगा और कहीं भारी वर्षा होगी। 
विज्ञापन


प्रदूषक गैसें मनुष्य और जीवधारियों में अनेक जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकती हैं। एक अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि वायु प्रदूषण से केवल 36 शहरों में प्रतिवर्ष 51,779 लोगों की अकाल मृत्यु हो जाती है। कलकत्ता, कानपुर तथा हैदराबाद में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्युदर पिछले 3-4 सालों में दुगुनी हो गई है। एक अनुमान के अनुसार हमारे देश में प्रदूषण के कारण हर दिन करीब 150 लोग मरते हैं और सैकड़ों लोगों को फेफड़े और हृदय की जानलेवा बीमारियां हो जाती हैं। 

 

विज्ञापन

SGT University - फोटो : SGT University
एक अन्य पर्यावरणीय समस्या वनों की कटाई है। विश्व में प्रति वर्ष 1.1 करोड़ हेक्टेयर वन काटा जाता है। अकेले भारत में 10 लाख हेक्टेयर वन काटा जा रहा है। वनों के विनाश के कारण वन्यजीव लुप्त हो रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल में लगातार होती कमी के कारण भूमि का कटाव और रेगिस्तान का फैलाव बढ़े पैमाने पर होने लगा है।बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आज ईंधनों, कोयला और पेट्रोलियम जनित उद्योगों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। अनुमानतः विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 4.5 अरब टन जीवश्म ईंधन की खपत हो रही है। जिसके फलस्वरूप कार्बन डाईऑक्साइड सहित सभी ग्रीन हाउस गैसें वायुमण्डल में पहुंच रही हैं। 

लगभग 7.7 करोड़ प्रतिवर्ष की दर से बढ़ती हुई विश्व की जनसंख्या आज 35 वर्षों में दुगुनी हो रही है। अकेले भारत में ही प्रतिवर्ष 1.7 करोड़ की आबादी बढ़ रही है यानी हर साल तीन नार्वे जुड़ रहे हैं। २०वीं सदी के महज कुछ दशकों में ही दुनिया की आबादी में चौंकाने वाली वृद्धि दर्ज की गई है। सन १९०० में विश्व की आबादी 1.65 अरब थी जो 1960 में लगभग दुगुनी होकर 3.02 अरब हो गई और ऐसा अनुमान है कि 199 में आबादी ६ अरब के आँकड़े को पार कर गई है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का आकलन है कि सन 2050 तक विश्व में 9.3 अरब लोग निवास कर रहे होंगे और 2200  ईस्वी तक हम 99 अरब होकर स्थिर हो जाएँगे।  

अगले 50 वर्षो में अनुमानित डेढ़ गुनी जनसंख्या वृद्धि पर्यावरण को कितना गुना नुकसान करेगी यह अनुमान से परे है। लगातार बढ़ रही जनसंख्या की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु गहन कृषि तथा औद्योगिकीकरण पर जोर ने पर्यावरण का यह हाल किया है कि जिस आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अमेरिका या यूरोप में बैठी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने कारखाने चला रही हैं, उन्हीं कारखानों से फैलनेवाला प्रदूषण समूची जनसंख्या को निगलने को तैयार बैठा है।  
ग़रीब देशों की जनता इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं बल्कि हालात की शिकार है। विश्व में आज एक किस्म का 'पर्यावरणीय जतिभेद' पनप रहा है, जिसे देखकर भी हम मूक बने बैठे हैं। विकसित अमेरिकी देशों से इलेक्ट्रोनिक या औद्योगिक विषाक्त कचरे का 50-90%, भारत या चीन जैसे विकास–शील देशों में फेंका जाता है।  

वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि पृथ्वी पर लगभग 300 लाख प्रजातियों के जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधे हैं। अभी तक इनमें से केवल 15 लाख का ही पता लगाकर उनका विवरण तैयार किया जा सका है। इनमें से 724 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और 22,530 प्रजातियाँ विलुप्त होने की स्थिति में हैं।'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया' के श्लोक उस समय रचे गए थे जब न तो वैज्ञानिक या तकनीकि चमत्कार की चकाचौंध थी और न पर्यावरण प्रदूषण का प्रकोप। 'सर्व' के सुखी और निरोग देखने की व्यापक कल्पना का तानाबाना बुनते–बुनते, आज हम इतना आगे बढ़ चले हैं कि स्वयं को ही हमेशा तनावपूर्ण और रोगग्रस्त होने की शिकायतों से घिरे हुए पाते हैं।  

इसकी ज़िम्मेदारी आख़िर किसके ऊपर डाली जाए? 

एसजीटी यूनिवर्सिटी नई खोज, नए शोध के लिए एक पॉवरहाउस की तरह है। यहां हमेशा नए 
क्षेत्रों में शोध कार्य होते रहते हैं जो स्थानीय लोगों के लिए भी उपयोगी होते हैं। हमारे छात्र, 
अध्यापक और शोधार्थी शोध को लेकर अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।   सामुदायिक सेवा में भी एसजीटी यूनिवर्सिटी महत्त्वपूर्ण भूमिका में है। शोध भागीदारी के रूप  में यूनिवर्सिटी शोधार्थियों और स्थानीय व्यवसाय के बीच सेतु की तरह है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें