जस्टिस चंद्रन ने खुद को किया सुनवाई से अलग
इससे पहले 18 अगस्त को सीजेआई की अगुवाई वाली बेंच का हिस्सा रहे जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। मामला बाद में जस्टिस माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली बेंच के पास पहुंचा, जिसने अपील खारिज कर दी।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि खातून कुलपति इसलिए बनीं क्योंकि उन्हें अपने पति का निर्णायक वोट मिला। उस समय उनके पति एएमयू के कुलपति थे। पति का अपनी पत्नी के पक्ष में वोट देना हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) बताया गया।
जस्टिस चंद्रन ने खुद को मामले से अलग करते हुए कहा, "मैं सीएनएलयू (कंसोर्टियम ऑफ नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी) का चांसलर था, जब मैंने फैजान मुस्तफा का चयन किया था। इसलिए मैं इस सुनवाई से अलग हो रहा हूं।"
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "हमें जस्टिस चंद्रन पर पूरा भरोसा है। उन्हें अलग होने की जरूरत नहीं है। वे इस पर फैसला ले सकते हैं।"
लेकिन सीजेआई ने कहा, "यह मेरे भाई (जस्टिस चंद्रन) पर निर्भर है। इस मामले को ऐसी बेंच के पास भेजा जाए, जिसमें जस्टिस चंद्रन शामिल न हों।"