सुप्रीम कोर्ट ने किस बात पर आपत्ति जताई?
अदालत ने कहा कि असली फर्क आलोचना और चुप्पी के बीच नहीं है, बल्कि जिम्मेदार बातचीत और बिना जानकारी के किए गए दावे के बीच है।
पीठ ने कहा, "न्यायपालिका, एक संस्था के रूप में, आलोचना से परहेज नहीं करती और न ही कर सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, सूचनापरक और रचनात्मक आलोचना एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की वैध और आवश्यक विशेषता है, जो संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार में योगदान देती है। हालांकि, आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी आलोचना उचित मंच के माध्यम से और निष्पक्ष, तर्कसंगत प्रक्रिया में व्यक्त की जाए और वह बिना सत्यापन के ऐसे स्कूली पाठ्यक्रम में जगह न बनाए, जो ऐसी उम्र के बच्चों के लिए है जो अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं।"
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 1 सितंबर के आदेश में यह टिप्पणी की थी, जिसकी जानकारी बाद में उपलब्ध कराई गई।
तीन शिक्षाविदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या कहा था?
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले 11 मार्च को दिए अपने आदेश में केंद्र और सभी राज्यों को तीन शिक्षाविदों से अलग रहने का निर्देश दिया था।
- इन तीनों में प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दीवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार शामिल थे।
हालांकि, बाद में तीनों शिक्षाविदों ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि किताब की सामग्री तैयार करने में किसी एक व्यक्ति की अकेले भूमिका नहीं थी, बल्कि यह सामूहिक प्रक्रिया थी।
तीनों की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश में बदलाव किया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र, राज्य, केंद्रशासित प्रदेश, सार्वजनिक विश्वविद्यालय और केंद्र या राज्य सरकार से वित्तीय सहायता पाने वाले संस्थान इस मामले में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकते हैं। उन्हें 11 मार्च के आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित होने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च की टिप्पणी में क्या बदलाव किया?
अदालत ने 11 मार्च के आदेश के एक हिस्से को भी वापस ले लिया। इस हिस्से में कहा गया था कि तीनों शिक्षाविदों ने जानबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और कक्षा 8 के विद्यार्थियों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि उसकी टिप्पणियां संबंधित सामग्री के संदर्भ में थीं, व्यक्तियों के संदर्भ में नहीं।