याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील तन्वी दुबे ने कहा कि वजीफा न देना उनके मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। उन्होंने कहा, "अगर कई अन्य कॉलेज विदेशी मेडिकल स्नातकों को वजीफा दे रहे हैं, तो इस भेदभाव का कोई कारण नहीं है।"
उन्होंने कहा कि वर्तमान याचिका विदेशी मेडिकल स्नातकों द्वारा दायर की गई है, जो वर्तमान में राजस्थान के सिरोही, अलवर, दौसा और चित्तौड़गढ़ सहित सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इंटर्नशिप कर रहे हैं।
अधिवक्ता चारु माथुर द्वारा दायर याचिकाओं में कहा गया है, "राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा जारी 4 मार्च, 2022 और 19 मई, 2022 के परिपत्र के अनुसार यह स्पष्ट रूप से प्रावधान किया गया है कि वजीफा भारतीय चिकित्सा स्नातकों के समान प्रदान किया जाना चाहिए।"
याचिकाओं में कहा गया है कि वजीफे का प्रावधान राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (अनिवार्य रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप) विनियम, 2021 के खंड 3 (अनुसूची IV) के तहत शासित है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे नियमित वजीफे के हकदार हैं।
याचिका में कहा गया है, "छात्रों को पहले यह अनुमान था कि उन्हें विनियमन के अनुसार उनकी इंटर्नशिप की अवधि के लिए वजीफा दिया जाएगा। हालांकि, वे यह देखकर हैरान रह गए कि जब वे इंटर्नशिप में शामिल हुए, तो उन्हें एक हलफनामे पर यह वचन देने के लिए मजबूर किया गया कि इंटर्नशिप बिना किसी वजीफे के होगी।"
इसमें आगे कहा गया, "यह छात्रों के लिए दुविधा की स्थिति थी क्योंकि उनके पास उस वचनपत्र पर हस्ताक्षर करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था। इंटर्नशिप में शामिल होने के दौरान उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि उन्हें आवास, यात्रा आदि सहित दिन-प्रतिदिन भारी खर्च उठाना पड़ेगा। उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि ग्रामीण पोस्टिंग में शामिल खर्च भी उन्हें ही वहन करना पड़ा।"