न्यायमूर्ति जे. बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भी नोटिस भेजा है। कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता पूरी तरह से नेत्रहीन हैं और उन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस पर न्यायमूर्ति पारडीवाला ने कहा, "यह सरकार की बहुत बड़ी गलती है।"
पहले भी भेजे जा चुके हैं नोटिस
बेंच ने यह नोटिस इसलिए भी जारी किया क्योंकि परीक्षा 31 अगस्त से शुरू होनी है और इससे पहले भेजे गए नोटिसों के बावजूद कोई पेश नहीं हुआ।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 3 मार्च को मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा नियमों में नेत्रहीनों को बाहर करने के प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया था। कोर्ट ने कहा था कि नेत्रहीनों को न्यायिक सेवा में रोजगार के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने उस फैसले में कहा था, "अब समय आ गया है कि दिव्यांगजनों के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ अधिकारों को मौलिक अधिकारों के बराबर दर्जा दिया जाए।"
शुक्रवार को जिस याचिका पर नोटिस जारी हुआ है, उसमें 16 मई को प्रकाशित उत्तराखंड न्यायिक सेवा भर्ती विज्ञापन को संविधान और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016 के खिलाफ बताया गया है।
याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में कहा गया है कि इस भर्ती में दिव्यांगजनों की पात्रता केवल चार श्रेणियों तक सीमित कर दी गई है - कुष्ठ रोग से ठीक हुए व्यक्ति, एसिड अटैक पीड़ित, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और बौनेपन से ग्रस्त लोग। इससे नेत्रहीन और अंग विकलांग जैसे कई अन्य मानक दिव्यांग अभ्यर्थियों को बाहर कर दिया गया है।
इसके साथ ही याचिका में यह भी बताया गया कि केवल उत्तराखंड के निवासी दिव्यांगजनों को पात्र माना गया है, जो RPwD Act की धारा 34 के खिलाफ है। इस धारा में सरकारी नौकरियों में 4% आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें 1% नेत्रहीन/कम दृष्टि और 1% अंग विकलांगों के लिए तय किया गया है।
याचिका में यह मांग की गई है कि गैर-निवासी दिव्यांग अभ्यर्थियों को बाहर किए जाने और पात्रता को केवल चार श्रेणियों तक सीमित करने वाले प्रावधान को रद्द किया जाए।