एनईपी लागू होने के बाद शिक्षा प्रणाली की सूरत बदली है: प्रो. अनिल
शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट को साथ लाकर कैसे युवा वर्ग अपने सपनों को पूरा कर सकता है? कैसे इंडस्ट्रीज की मांग के अनुसार छात्रों को तैयार किया जा सकता है? इन जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारी शिक्षा प्रणाली कैसी होनी चाहिए? इस विषय पर चर्चा करते हुए प्रो. अनिल ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू हुए चार वर्षों से ज्यादा का समय हो गया है। इसके लागू होने के बाद बहुत चीजें बदली हैं और लगातार बदल रही हैं।
यह भी पढ़ें: उच्च शिक्षा में प्रवेश, विदेश में पढ़ाई या नौकरी... छात्रों के लिए सीवी का काम करेगी ये एक चीज
हालांकि, बहुत सारे स्कूलों में अभी वो सुविधाएं या बदलाव नहीं हैं जो होने चाहिए, लेकिन इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए नीति आयोग की ओर से स्कूलों में टिंकरिंग लैब्स की शुरुआत की गई। छठी से आठवीं तक के छात्र जब इन लैब्स गए और वहां उन्होंने तोड़-फोड, जोड़-तोड़ यानी प्रयोग किए तो समझ आया कि कौशल विकास में उनकी रुचि है। हालांकि, उस समय सपोर्ट सिस्टम थोड़ा कम था।
इस वर्ष के बजट में बताया गया कि अगले 5 वर्षों में और 50,000 टिंकरिंग खोले जाएंगे। यह एनईपी के तहत निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति की दिशा में पहल है, जिसमें छठी कक्षा से ही स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देने का प्रावधान है।
यह भी पढ़ें: क्या AI छीन सकता है आपकी नौकरी? जानें एक्सपर्ट ने क्या कहा
जनरल एजुकेशन और स्किल एजुकेशन एक दूसरे के पूरक
प्रो. अनिल ने कहा कि शिक्षा और कौशल एक दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि जनरल एजुकेशन, स्किल एजुकेशन के बिना व्यर्थ है। इसी प्रकार, स्किल एजुकेशन, जनरल एजुकेशन के बिना यूजलेस है। ऐसे में इन दोनों को जुड़ाव होना बेहद जरूरी है।
हमारे ग्रेजुएट छात्रों को रोजगार के लायक क्यों नहीं समझती थीं इंडस्ट्रीज?
प्रो. अनिल ने कहा कि एक समय था जब इंडस्ट्रीज कहती थीं कि हमारे ग्रेजुएट छात्र रोजगार के लायक नहीं हैं। इसकी बड़ी वजह स्किल की कमी होती थी। हालांकि, आज के समय में स्थिति थोड़ी बदली है क्योंकि पिछले 8-10 वर्षों में स्किलिंग और अनुभवात्मक शिक्षा (Experinecial Learning) पर काम हुआ है।
रोजगार बाजार की जरूरत और छात्रों में कौशल विकास के बीच के अंतर को पाटने के लिए 8 साल पहले स्मार्ट इंडिया हैकेथॉन की शुरुआत की गई थी। इसके तहत छात्रों को सरकारी और प्राइवेट विभागों, स्टार्टअप्स, उद्योग जगत, एनजीओ और समाज से आने वाले करीब 500 प्रॉब्लम स्टेटमेंट दिए जाते थे। जो भी छात्र आउट ऑफ द बॉक्स सॉल्यूशन देते हैं, उन्हें शॉर्टलिस्ट किया जाता है।
यह भी पढ़ें: पढ़कर नहीं, करके सीखने की जरूरत: यह समझ आ गया तो आसान हो जाएगी सफलता की राह
युवाओं को सपोर्ट, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन की जरूरत
खास बात यह है कि ये वह प्रॉब्लम होती थीं, जो बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज, सरकारी एजेंसी जैसे ईसरो, डीआरडीओ, रेलवे मंत्रालय के बड़े-बड़े लोग दस सालों में भी सॉल्व नहीं कर सके थे, उन्हें हमारे अंडर ग्रेजुएट के छात्रों ने सॉल्व कर दिया। इससे पता चलता है कि युवाओं को सपोर्ट, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन की जरूरत है। एनईपी के सारे पहलु अगर अगले पांच साल लागू करेंगे तो निश्चय ही अच्छा रिजल्ट मिलेगा।
प्रो. अनिल सहस्त्रबुद्धे के बारे में
प्रो. अनिल सहस्रबुद्धे राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद, बेंगलुरु की कार्यकारी समिति के वर्तमान अध्यक्ष हैं। वे वर्तमान में राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम (NETF) और राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (NBA) के अध्यक्ष हैं। इससे पहले सहस्रबुद्धे अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। पूर्व में वह कई शिक्षण संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाओं पर सेवा दे चुके हैं। प्रो. अनिल सहस्रबुद्धे ने 1980 में कर्नाटक विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.ई. किया और प्रथम रैंक और स्वर्ण पदक प्राप्त किया। उन्होंने 1982 में भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर से मास्टर्स और 1989 में पीएचडी की।