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इंडियाना यूनिवर्सिटी: ये स्कूल दे रहा समाज सुधारने की शिक्षा, तीन साल में 300% बढ़े दाखिले, 100% प्लेसमेंट

Mon, 02 Nov 2026 10:58 AM IST
शिवम तिवारी अमर उजाला नेटवर्क

सार

Philanthropy as a Career: समाज सेवा अब केवल मदद करने का जरिया नहीं, बल्कि शानदार करियर का विकल्प भी बन रही है। अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी में परोपकार की पढ़ाई करने वाले युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस क्षेत्र में एनजीओ, ट्रस्ट, बड़ी कंपनियों और सरकारी विभागों में नौकरियां मिल रही हैं। जानें इस पढ़ाई की खासियत, नौकरी के मौके और लाखों रुपये तक के वेतन के बारे में।
 
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विस्तार
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इंडियाना। एला ट्रेना (19) जब अपने भविष्य के बारे में सोचती हैं तो करोड़ों कमाने या किसी बड़ी कंपनी का सीईओ बनने के बजाय उनका ध्यान सिर्फ इस पर होता है कि इस दुनिया को थोड़ा और बेहतर कैसे बनाया जाए। 
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इंडियाना यूनिवर्सिटी के लिली फैमिली स्कूल ऑफ फिलैंथ्रोपी की द्वितीय वर्ष की छात्रा एला ट्रेना उस जेन-जी समूह का हिस्सा हैं, जो अरबपतियों की बढ़ती दौलत के इस दौर में दान और परोपकार की कला सीख रही है। लिली फैमिली स्कूल ऑफ फिलैंथ्रोपी दुनिया में अपनी तरह का पहला स्कूल है जो परोपकार की शिक्षा देता है। संस्थान का जॉब प्लेसमेंट रेट 100% रहा है जो कि यूनिवर्सिटी के बिजनेस स्कूल के छात्रों से भी बेहतर है। एजेंसी

एनजीओ, ट्रस्ट, कॉर्पोरेट में मिल रहीं नौकरियां

लिली फैमिली स्कूल ऑफ फिलैंथ्रोपी में दाखिला लेने वालों की संख्या पिछले एक दशक में 300% बढ़ी है। छात्रों को गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ), चैरिटेबल ट्रस्ट, कॉर्पोरेट्स और सरकारी विभागों में अच्छे विकल्प मिल रहे हैं। इंडियाना यूनिवर्सिटी में परोपकार की शिक्षा की जड़ें दशकों पुरानी हैं। यूनिवर्सिटी ने 1987 में डोनेशन और चैरिटी से जुड़ी पढ़ाई व रिसर्च को एक व्यवस्थित केंद्र का रूप दिया था। इसके 25 साल बाद, 2012 में इसे औपचारिक रूप से एक अलग स्कूल के रूप में स्थापित किया गया, जिससे यह इस विषय की पढ़ाई कराने वाला दुनिया का पहला संस्थान बन गया।

समाज सेवा में भी कमाई...65% पा रहे 60 लाख का पैकेज 

आमतौर पर माना जाता है कि समाज सेवा का मतलब कम वेतन या मुफ्त में काम करना है लेकिन आंकड़े इस पुरानी सोच को पूरी तरह गलत साबित कर रहे हैं। एनजीओ सेक्टर से जुड़े 65% से अधिक लोग सालाना 60 लाख रुपये से ज्यादा की कमाई कर रहे हैं जो अमेरिका के औसत वेतन से लगभग 15% ज्यादा है। फॉर्च्यून 500 कंपनियों में परोपकार से जुड़ी नौकरियों का पैकेज तो एक करोड़ रुपये से भी ऊपर चला जाता है। बतौर उदाहरण, वॉलमार्ट ने अरकांसस में एक ग्रांट मैनेजर पद के लिए 180,000 डॉलर तक का विज्ञापन दिया था, जबकि माइक्रोसॉफ्ट ने कम्युनिटी अफेयर्स की भूमिका के लिए 275,000 डॉलर तक के पैकेज की पेशकश की थी।

सार्थक उद्देश्य की तलाश ने बदली सोच

आज का युवा सिर्फ मोटा वेतन नहीं चाहता, बल्कि अपने काम में सार्थक उद्देश्य की तलाश करता है। सर्वे बताते हैं कि करीब 79% युवा ऐसा करियर चाहते हैं जिसका सीधा सकारात्मक असर लोगों की जिंदगी पर पड़े।
छात्रों का कहना है, अगर आपको नौकरी न मिले या फिर अपनी डिग्री पर कोई पछतावा भी हो तो भी कम से कम आप यह तो सीख ही जाएंगे कि लोगों की मदद कैसे की जाती है और समाज में बदलाव कैसे लाया जाता है।

40% ने ठुकराए ऑफर

डेलॉइट की 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 44 फीसदी युवाओं ने ऐसी नौकरियां सिर्फ इसलिए छोड़ दीं क्योंकि उन्हें अपने काम में कोई सामाजिक मकसद नजर नहीं आया जबकि लगभग 40% ने इसी वजह से नौकरी का ऑफर ठुकरा दिया।
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