समिति ने रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए लिखा है कि निजी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों को आरक्षण देना संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है। आरक्षण को लागू करने में निजी संस्थानों को सहयोग देने के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (Ews) के लिए 25% आरक्षण प्रावधान का पालन किया जा सकता है। अभी निजी संस्थान आरक्षण को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं, क्योंकि कानून नहीं है। रिपोर्ट में बिट्स, ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और शिव नादर यूनिवर्सिटी के आंकड़ों का हवाला देते हुए समिति ने निजी संस्थानों में आरक्षित वर्ग के छात्रों के निराशाजनक प्रतिनिधित्व पर चिंता जताई।
फीस बहुत अधिक, कानून बनाने की जरूरत
यह भी कहा कि निजी विवि में फीस बहुत अधिक है, इसलिए राज्य सरकार कानून बनाए। आरक्षित श्रेणी के छात्र बीच में पढ़ाई न छोड़े, उसके लिए छात्रवृति के जरिये हॉस्टल आवंटित हो। जाति घोषणा को वैकल्पिक बनाने की मौजूदा व्यवस्था से प्रवेश प्रक्रिया में छात्रों के साथ जातीय भेदभाव हो सकता है। वो मानसिक प्रताड़ना झेल सकते हैं। छात्रों को यह घोषित करने का विकल्प दिया जा सकता है कि उनकी जातिगत कोई पहचान नहीं है।
सामाजिक न्याय में भी बाधा
रिपोर्ट में कहा गया है कि उच्च शिक्षा दो तरह से बंट गई है। निजी और चुनिंदा सरकारी संस्थानों के पास बेहतर संकाय और संसाधन हैं। दूसरी ओर बहुसंख्यक संस्थान पहले वाले के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे। सार्वजनिक संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान और निजी में प्रावधान का अभाव, देश में सामाजिक न्याय प्राप्ति में बाधा है। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 15(5) को कानून बनाकर पूरे देश में लागू किया जाए।