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महाराष्ट्र: कभी माओवादी दल का हिस्सा थे पिता, अब बेटी अरविंदा बनी ट्रेनी इंजीनियर; पढ़ें पूरी कहानी

Tue, 01 Sep 2026 10:17 AM IST
शाहीन परवीन एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की 20 वर्षीय अरविंदा बरसागाडे ने मुश्किल हालात के बावजूद सिविल इंजीनियर के रूप में अपनी नई पहचान बनाई है। उनके पिता कभी नक्सली दल का हिस्सा थे, लेकिन अरविंदा ने मेहनत और शिक्षा के दम पर अपना भविष्य बदला।
 
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अरविंदा बनी ट्रेनी इंजीनियर - फोटो : AI
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विस्तार
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महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की 20 वर्षीय अरविंदा बरसागाडे ने ट्रेनी इंजीनियर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की है। उनके पिता कभी माओवादी दल का हिस्सा थे, लेकिन परिवार ने उस दौर को पीछे छोड़कर शिक्षा और रोजगार के जरिए नई पहचान बनाई है।

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सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद, वह जिले के हेदरी में लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी के LT गोंडवाना स्किल हब से जुड़ी हैं।

नौकरी छोड़ी, 2005 में माओवादियों में शामिल हुए पिता

पूर्वी महाराष्ट्र का यह जिला, जिसकी सीमा छत्तीसगढ़ से लगती है, कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था। मार्च 2026 में, केंद्र सरकार ने इस इलाके को नक्सल-मुक्त घोषित कर दिया।

अरविंदा सिरोंचा तहसील के भोगापुर में पली-बढ़ीं। गांव में न तो बिजली थी और न ही सड़कें।

उनके पिता राजबाबू बरसागाडे करासपल्ली ग्राम पंचायत में काम करते थे। लेकिन कुछ दिक्कतों की वजह से उन्होंने नौकरी छोड़ दी और 2005 में माओवादियों में शामिल हो गए।

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उनकी मां लता को अगले पांच वर्षों तक बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अरविंदा को याद है कि कभी-कभी उनकी मां उन्हें अपने पति की तलाश में जंगल ले जाती थीं।

राजबाबू बरसागाडे ने 2010 में पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। मुश्किल हालात के बावजूद, अरविंदा ने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और पिछले साल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कोर्स भी किया।

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मां और शिक्षकों को दिया सफलता का श्रेय

अभी वह लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी की ओर से कर्मचारियों के लिए अल्दांडी में बन रही टाउनशिप में ट्रेनी साइट इंजीनियर के तौर पर काम कर रही हैं, लेकिन उनके सपनों का सफर यहीं खत्म नहीं होता।

वह कहती हैं कि वह नौकरी के साथ-साथ अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं और B.Tech करना चाहती हैं। उन्हें खुशी है कि उन्होंने अपने माता-पिता, खासकर अपनी मां को गौरवान्वित किया है, जिन्होंने बहुत संघर्ष किया था।

अपनी मां के अलावा, वह अपनी सफलता का श्रेय अपने कॉलेज के टीचर अनिल दामोदे और वकील कविता मोहार्कर को देती हैं। अरविंदा बताती हैं कि दामोदे ने उन्हें प्रेरित किया और सकारात्मक सोच रखना सिखाया, जबकि मोहार्कर ने उनके करियर में उनका मार्गदर्शन किया।
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