कक्षा 9 से क्या होंगे ‘कौशल ट्रैक’ और इनका फायदा क्या होगा?
नीति आयोग ने कक्षा 9 से ‘कौशल ट्रैक’ शुरू करने का सुझाव दिया है। ये ऐसे व्यवस्थित व्यावसायिक रास्ते होंगे, जिनके जरिए विद्यार्थी किसी खास क्षेत्र में धीरे-धीरे विशेषज्ञता हासिल कर सकेंगे।
इन पाठ्यक्रमों को स्थानीय और देश की जरूरत के हिसाब से तैयार करने की बात कही गई है। इसका मकसद यह है कि विद्यार्थी स्कूल से निकलने के बाद केवल डिग्री के भरोसे न रहें, बल्कि उनके पास काम से जुड़े व्यावहारिक कौशल भी हों।
आयोग का कहना है कि स्किलिंग जितनी जल्दी शुरू होगी, विद्यार्थियों के लिए आगे चलकर रोजगार और करियर के विकल्प चुनना उतना आसान होगा।
अभी कितने स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा पहुंची है?
नीति आयोग ने माना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा में कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा और रोजगार कौशल को जोड़ने का मार्गदर्शन दिया गया है। हालांकि, जमीन पर इसका विस्तार अभी सीमित है।
- रिपोर्ट के अनुसार, माध्यमिक स्तर के 12 स्कूलों में से 1 से भी कम स्कूलों में व्यावसायिक विषय उपलब्ध हैं।
- यानी नीति में प्रावधान होने के बावजूद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को अभी स्कूल स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा का विकल्प नहीं मिल रहा है।
कक्षा 10 और 12 के बोर्ड पैटर्न में भी बदलाव की सिफारिश
नीति आयोग ने बोर्ड परीक्षाओं के विषयों को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। आयोग ने कहा है कि कक्षा 10 और 12 के विषयों की व्यवस्था में व्यावसायिक विषयों को शामिल किया जाना चाहिए।
इन विषयों को सामान्य विषयों के बराबर महत्व और अंक देने की सिफारिश की गई है। साथ ही, राज्यों के बोर्ड को कक्षा 10 के बोर्ड प्रमाणपत्र में संशोधित विषय व्यवस्था को स्वीकार करने का सुझाव दिया गया है।
रिपोर्ट में कक्षा 11 और 12 के सभी विद्यार्थियों के लिए सामान्य रोजगार और उद्यमिता कौशल को अलग विषय के रूप में जारी रखने की भी बात कही गई है।
क्या सिर्फ स्कूल ही नहीं, कॉलेज की पढ़ाई भी बदलेगी?
नीति आयोग ने उच्च शिक्षा व्यवस्था में भी बड़े बदलाव की जरूरत बताई है। रिपोर्ट के अनुसार, कई पाठ्यक्रम पुराने और सामान्य प्रकृति के हैं। वहीं, सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या अधिक है। इसका असर उनकी रोजगार क्षमता पर पड़ता है।
आयोग ने कहा कि उच्च शिक्षा को श्रम बाजार की जरूरतों से बेहतर तरीके से जोड़ना होगा। इसके लिए उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल और अप्रेंटिसशिप से जुड़े डिग्री व डिप्लोमा कार्यक्रम बढ़ाने का सुझाव दिया गया है।
किन क्षेत्रों में रोजगार आधारित स्किलिंग पर जोर होगा?
नीति आयोग ने कहा है कि आगे स्किलिंग की दिशा मांग के आधार पर तय होनी चाहिए। खासतौर पर तेजी से बढ़ने वाले क्षेत्रों में युवाओं को तैयार करने की जरूरत है। रिपोर्ट में उदाहरण के तौर पर इन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है:
- हरित उद्योग
- इलेक्ट्रिक वाहन
- रोजगार और उद्यमिता से जुड़े सामान्य कौशल
- ऐसे क्षेत्रों के लिए दोबारा प्रशिक्षण, जहां रोजगार की मांग घट रही है
आयोग ने काम के साथ पढ़ाई, अप्रेंटिसशिप से जुड़े डिग्री कार्यक्रम और कम अवधि के मॉड्यूलर पाठ्यक्रम बढ़ाने की बात कही है। साथ ही, ऐसे विकल्पों का विस्तार करने का सुझाव दिया गया है, जिनमें विद्यार्थी सीखने के साथ कमाई भी कर सकें।
अप्रेंटिसशिप को लेकर नीति आयोग ने क्या कहा?
रिपोर्ट में अप्रेंटिसशिप को शिक्षा और रोजगार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बताया गया है। आयोग का कहना है कि इसे मुख्यधारा और भरोसेमंद करियर विकल्प के रूप में स्थापित करने की जरूरत है।
राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (एनएपीएस) और राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण योजना (एनएटीएस) जैसी योजनाओं से अवसर बढ़े हैं। राज्यों के स्तर पर भी कई कार्यक्रम चल रहे हैं। फिर भी, इनका लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।
आयोग ने अप्रेंटिसशिप को मजबूत बनाने के लिए सुझाव दिए हैं:
- छोटे और मझोले उद्योगों को प्रोत्साहन देकर अवसर बढ़ाना।
- सभी अवसरों तक पहुंच के लिए एकीकृत राज्य स्तर का मंच तैयार करना।
- भरोसेमंद अप्रेंटिसशिप अवसरों की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराना।
- प्रशिक्षण को विद्यार्थियों और रोजगार की वास्तविक मांग से जोड़ना।
7.67 करोड़ से ज्यादा लोगों को मिल चुकी है ट्रेनिंग, फिर भी चुनौती क्यों?
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014-15 से अब तक 7.67 करोड़ से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। कौशल विकास को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के बजट में विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों के जरिए कौशल विकास से जुड़े खर्च के लिए 34,000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। हालांकि, नीति आयोग ने साफ कहा है कि प्रशिक्षण की संख्या बढ़ने के बावजूद उसके नतीजे अभी समान नहीं हैं।
आयोग के अनुसार, आगे केवल कितने लोगों को प्रशिक्षण मिला, यह देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना जरूरी होगा कि प्रशिक्षण के बाद कितने लोगों को रोजगार मिला, उनकी आय में कितना सुधार हुआ और उनके कौशल की वास्तविक बाजार में कितनी मांग है।