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सीजेपी आंदोलन: नीट प्रदर्शन मामले में समिति बदलने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, क्यों नहीं मानी पुनर्गठन की मांग?

Thu, 10 Sep 2026 07:33 PM IST
आकाश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली

सार

NEET Protest Case: नीट प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए बनी पांच सदस्यीय समिति के पुनर्गठन की मांग सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि समिति उसके निर्देश और निगरानी में काम करेगी। पढ़ें पूरी रिपोर्ट...
 
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Supreme Court - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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NEET Protest Case: नीट प्रदर्शन के मामले में गठित पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति के पुनर्गठन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि वह समिति को लेकर किसी पूर्वाग्रह की धारणा के आधार पर आगे नहीं बढ़ेगी और समिति में किसी तरह का बदलाव नहीं किया जाएगा।

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पीठ ने कहा कि समिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में काम करेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर समिति की जांच में कहीं कोई गलती सामने आती है तो संबंधित पक्ष अदालत को बता सकते हैं और इस मामले में खुली सुनवाई की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने समिति के पुनर्गठन से क्यों किया इनकार?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अदालत की ओर से गठित समिति को पहले से पक्षपाती मानकर नहीं चला जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “समिति हमारा विस्तारित हाथ है। हम किसी बदलाव पर सहमत नहीं होंगे। समिति सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम करेगी। हम इसका पुनर्गठन नहीं करेंगे। समिति को काम करने दें, हम देखेंगे। हम इससे पीछे नहीं हट रहे हैं। अगर किसी को लगता है कि समिति कहीं गलत गई है, तो हमें बताएं। हम खुली सुनवाई करेंगे।”

याचिकाकर्ताओं ने समिति के एक सदस्य पर क्या सवाल उठाया?

सुनवाई के दौरान एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने समिति के एक सदस्य को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पैनल में शामिल पूर्वोत्तर राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक के मामले में हितों का टकराव हो सकता है।

भूषण ने दलील दी कि समिति के संबंधित सदस्य एक ऐसे वरिष्ठ पदाधिकारी के करीबी मित्र हैं, जिनके जांच के दायरे में आने की संभावना है। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया।

समिति के लिए अलग न्याय मित्र की मांग

गोपाल शंकरनारायणन ने समिति के कामकाज को लेकर एक अलग न्याय मित्र और अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड नियुक्त करने की मांग भी रखी। उनका कहना था कि समिति को स्वतंत्र रूप से काम करना है, इसलिए उसका प्रतिनिधित्व सरकारी वकील के माध्यम से नहीं होना चाहिए।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन दलीलों का विरोध किया और अदालत से ऐसे आरोपों को नजरअंदाज करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “उनके अनुसार, एक-दो लोगों को छोड़कर पूरा देश बेईमान है।”

पूर्व मेघालय डीजीपी को समिति में क्यों शामिल किया गया?

  • मुख्य न्यायाधीश ने वकीलों को बताया कि पूर्व मेघालय डीजीपी को समिति में शामिल करने के पीछे भी एक कारण था।
  • उन्हें पूर्वोत्तर राज्य के डीजीपी के रूप में उनके अनुभव को देखते हुए चुना गया है और इस वजह से उनके मुख्य भूमि के राजनीतिक दलों के करीब होने की संभावना कम है।

न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि अदालत संबंधित सदस्य को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर विचार करेगी। हालांकि, उन्होंने समिति के सदस्य को पहले से पक्षपाती मानने की दलील को स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने कहा, “हम उस सदस्य के संबंध में आपकी आपत्तियों पर विचार करेंगे। लेकिन यह कहना कि इस अदालत के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली और हमारे द्वारा चुनी गई समिति के किसी सदस्य को पक्षपात की धारणा के साथ शुरुआत करनी चाहिए, ऐसी बात है जिसे हम स्वीकार नहीं कर सकते।”

जनता से भी मांगी जाएगी जानकारी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह ऐसा आदेश जारी करेगा, जिसके तहत सार्वजनिक सूचना जारी की जाएगी और उस पर लोगों से जवाब मांगा जाएगा। पीठ ने कहा कि जो भी व्यक्ति समिति के सामने अपनी बात रखना चाहता है, वह अपना पक्ष, जानकारी, दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत कर सकेगा। समिति इन सभी सामग्री पर विचार करेगी।

अदालत ने कहा, “जो भी समिति के सामने उपस्थित होना चाहता है, वह अपना पक्ष, जानकारी, दस्तावेज या साक्ष्य प्रस्तुत करने का हकदार होगा। समिति इस पर विचार करेगी। सदस्य सचिव एक तरह से रिकॉर्ड का संरक्षक होगा और पूरी सामग्री समिति के सामने रखेगा। सामान्य तौर पर यह किसी सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश या किसी अन्य न्यायिक अधिकारी को बनाया जा सकता है।”

ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट पर भी कार्रवाई

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि ग्रेटर नोएडा के उस कार्यकारी मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है, जिसने मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाले जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने को लेकर एक छात्र को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

पांच सदस्यीय समिति में कौन-कौन शामिल हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले पुलिस की कथित ज्यादती और प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की जांच के लिए पांच सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की थी। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।

समिति के अन्य सदस्यों में ये नाम शामिल हैं:
  • पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रवि शंकर झा
  • दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश शालिंदर कौर
  • सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला
  • मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी एल. आर. बिश्नोई

समिति को किन आरोपों की जांच करनी है?

उच्चाधिकार प्राप्त समिति को प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से अत्यधिक बल और हिंसा के आरोपों की जांच करनी है। इसमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा कथित तौर पर पेलेट गन के इस्तेमाल का आरोप भी शामिल है।

इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस अधिकारियों और अन्य सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ बल और हिंसा के कथित इस्तेमाल की भी जांच की जानी है।

सुप्रीम कोर्ट ने समिति का गठन करते समय कहा था कि इसके सदस्यों की व्यक्तिगत विशेषज्ञता, अनुभव और समिति की विविधता समेत कई बातों को ध्यान में रखा गया है। अदालत ने उम्मीद जताई थी कि समिति की सिफारिशें मामले में आगे की कार्रवाई के लिए उपयोगी साबित होंगी और समिति सभी संबंधित मुद्दों का व्यापक आकलन करेगी।
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क्या है पूरा मामला?

यह मामला उन याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें हालिया छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती के आरोप लगाए गए हैं। ये प्रदर्शन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व में हुए थे। दूसरी ओर, पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्रदर्शनकारियों की ओर से हिंसा के आरोप भी लगाए गए हैं।

दिल्ली में 20 जुलाई को संसद की ओर निकाले गए मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच झड़प हुई थी। संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठियों और आंसू गैस के गोले का इस्तेमाल किया था।

छात्रों के नेतृत्व में शुरू हुआ यह प्रदर्शन कई शहरों तक फैल गया था। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर थी।

यह आंदोलन 20 जून को जंतर-मंतर से शुरू हुआ था। 25 जुलाई को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों की अन्य मांगें स्वीकार किए जाने के बाद आंदोलन समाप्त कर दिया गया था।
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