नई किताब में क्या-क्या बदलाव किए गए हैं?
संशोधित अध्याय में कई पुराने हिस्सों को हटाकर नए विषय जोड़े गए हैं। मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं-
- 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' वाला पूरा हिस्सा हटा दिया गया है।
- अदालतों में लंबित मामलों (बैकलॉग) और न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों पर चर्चा भी अब नहीं है।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आधारित अलग सेक्शन को भी हटा दिया गया है।
- सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों से जुड़े उदाहरण भी किताब से निकाल दिए गए हैं।
बिग क्वेश्चन सेक्शन में क्या बदला?
अध्याय की शुरुआत में छात्रों के लिए दिए जाने वाले "बिग क्वेश्चन" भी बदल दिए गए हैं।
- पहले छात्रों से पूछा जाता था कि स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों जरूरी है।
- अब नया सवाल यह है कि 'एक न्यायपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाज के लिए न्याय क्यों महत्वपूर्ण है?'
कौन-कौन से हिस्से हटाए गए?
संशोधित संस्करण से कई चर्चित विषय हटा दिए गए हैं। इनमें शामिल हैं-
- न्यायपालिका की चुनौतियों पर पूरा सेक्शन।
- अदालतों में मामलों के भारी बोझ, न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाओं और कमजोर आधारभूत ढांचे पर चर्चा।
- पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के उस बयान का उल्लेख, जिसमें न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार और कदाचार की घटनाओं का जिक्र किया गया था।
- 'न्याय के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका क्यों जरूरी है?' शीर्षक वाला भाग।
- सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसलों पर आधारित कक्षा चर्चा।
किन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जिक्र हटाया गया?
नई किताब में दो महत्वपूर्ण फैसलों से जुड़े उदाहरण भी हटा दिए गए हैं। ये फैसले हैं-
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामला, जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए को रद्द किया गया था।
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत संघ मामला, जिसमें चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित किया गया था।
नई किताब में क्या जोड़ा गया है?
संशोधित अध्याय में कई नए विषयों को विस्तार से शामिल किया गया है। इनमें प्रमुख हैं-
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संविधान के तहत सुप्रीम कोर्ट की भूमिका।
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जनहित याचिका की अवधारणा।
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अनुच्छेद 32 और 226 के तहत जनहित याचिका की व्यवस्था।
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न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल)।
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वैकल्पिक विवाद समाधान ।
किताब में बताया गया है कि जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसके जरिए सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में न्याय सुनिश्चित किया जाता है।
इसके उदाहरण के तौर पर हुसैनारा खातून मामले में विचाराधीन कैदियों की रिहाई। एम.सी. मेहता के पर्यावरण संबंधी मामले। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े विशाखा फैसले का उल्लेख किया गया है।
पुस्तक तैयार करने वाली टीम में भी हुआ बदलाव?
संशोधित संस्करण में पुस्तक निर्माण टीम की सूची भी बदली गई है।
- पहले संस्करण में 51 सदस्य थे।
- नए संस्करण में 48 सदस्य हैं।
- मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार के नाम नई सूची में शामिल नहीं हैं।
हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया था कि पाठ्यपुस्तक तैयार करना सामूहिक प्रक्रिया थी और इन विशेषज्ञों की न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोई मंशा नहीं थी। इसके बाद अदालत ने अपने पहले के आदेश में संशोधन भी किया था।
विवाद के बाद सरकार ने क्या कदम उठाए?
विवाद के बाद केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्रालय ने कई कदम उठाए। इनमें शामिल हैं-
- पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में निगरानी समिति का गठन।
- समिति में पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रकाश सिंह को सदस्य बनाया गया।
- न्यायपालिका से जुड़े पाठ्यक्रम की समीक्षा में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के प्रमुख को भी शामिल किया गया।
- एनसीईआरटी ने राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण सामग्री समिति का पुनर्गठन किया।
अब यह समिति कक्षा 3 से 12 तक की पुस्तकों के विकास, अनुमोदन, प्रकाशन और वितरण की औपचारिक जिम्मेदारी भी निभाएगी।