सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ ही अब मुख्य न्यायाधीश का दफ्तर भी सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में आएगा। इस ऐतिहासिक फैसले को अमल में लाने का श्रेय जाता है सुभाष चंद्र अग्रवाल को जो आरटीआई कार्यकर्ता हैं। आपको बता रहे हैं कौन हैं सुभाष अग्रवाल और कैसे हुई थी उनकी मुहिम की शुरुआत।
2007 में शुरू हुई मुहिम
असल में ये पूरा मामला साल 2007 में शुरू हुआ था। नंवबर 2007 में आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने याचिका दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट से जजों की संपत्ति के बारे में जानकारी मांगी थी जो उन्हें देने से इनकार कर दिया गया।
इसके बाद सुभाष सीआईसी के पास पहुंचे और सीआईसी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि चूंकि सीजेआई का दफ्तर भी आरटीआई कानून के अंतर्गत आता है, इसलिए उन्हें इस आधार पर सूचना दी जा सकती है। जनवरी 2009 में सीआईसी के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।