गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनावी राज्यों में रैली के दौरान मास्क पहनने को सुनिश्चित करने के अनुरोध संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग और केंद्र को नोटिस भेजा है। बता दें चुनाव आयोग द्वारा पंचायत चुनाव कराने के संबंध में जारी दिशा-निर्देशों में कोविड-19 से बचाव के लिए जरूरी उपाय करने की बात कही गई है। किंतु इन गाइडलाइन्स का पालन न होने पर भी आयोग द्वारा कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई। आखिरकार हाईकोर्ट को डॉ विक्रम सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई में आयोग से जवाब मांगना पड़ा।
बीते महीने में ईवीएम खरीदने को लेकर भारत निर्वाचन आयोग और बिहार राज्य चुनाव आयोग के बीच चल रहे विवाद पर बिहार हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए सख्त निर्देश जारी किए थे। कोर्ट ने यह भी कहा था कि भारत निर्वाचन आयोग का यह नीतिगत फैसला है, इसमें कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए लेकिन अनावश्यक हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। इससे पहले भी चुनाव आयोग से संबंधित कई मामले कोर्ट पहुंचे हैं।
अब सवाल यह है कि क्या संवैधानिक और कानूनी तौर पर भारतीय निर्वाचन आयोग के पास वास्तव में कोई ऐसा अधिकार है जिसके जरिए वह राजनीतिक दलों, प्रत्याशियों और राज्य चुनाव आयोग पर कोई लगाम कस सके? आइए जानते हैं…
25 जनवरी 1950 को चुनाव आयोग की स्थापना की गई थी। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग का काम राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति, संसद और राज्य के विधानमंडल के कार्यालयों के चुनाव को संचालित करना है। साथ ही चुनाव से जुड़े दिशा-निर्देशों को जारी करना और उसके नियंत्रण का कार्य भी चुनाव आयोग द्वारा ही देखा जाता है।
1950 से 1987 तक भारतीय निर्वाचन आयोग में केवल एक ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त हुआ करते थे। पहली बार 16 अक्टूबर 1989 को दो अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति की गई थी। हालांकि दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान 01 अक्टूबर 1993 से शुरू हुआ। इन तीनों आयुक्तों का चुनाव राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त का दर्जा भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के समान होता है और उन्हें उनके ही समतुल्य सुविधाएं व वेतन मिलता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उनके पद से केवल संसद द्वारा महाभियोग के माध्यम से ही हटाया जा सकता है।
टी.एन.शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार संभालने से पहले तक चुनाव में बूथ कैप्चरिंग, सत्ता का दुरुपयोग, मतदाताओं के बीच पैसे और चीजें बांटकर लुभाना जैसी हरकतें आम थीं। लेकिन पदभार संभालने के बाद उन्होंने असरदार ढंग से आचार संहिता को लागू किया। चुनाव के दौरान भुजाबल और धनबल के इस्तेमाल पर लगाम लगाई। साथ उन लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी की जिन्होंने इन नियमों का उल्लंघन किया था। उदाहरण के तौर पर वर्ष 1993 में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद द्वारा अपने बेटे के लिए चुनावी प्रचार अभियान में हिस्सा लेने पर शेषन ने सतना में होने वाले मतदान को ही रद्द कर दिया था। साथ ही गुलशेर अहमद पर सख्त कार्रवाई भी की थी। नतीजतन अहमद को राज्यपाल पद से इस्तीफा देना पड़ा था।