नियम तोड़ने पर निलंबन और जुर्माने का प्रस्ताव
यूनियन सदस्यों के अनुसार, ड्राफ्ट में विभागाध्यक्षों और संबद्ध कॉलेजों के प्रिंसिपलों को नियमों का उल्लंघन करने वाले छात्रों पर कार्रवाई का अधिकार देने का प्रस्ताव है। इसमें निलंबन भी शामिल है। हिंसक गतिविधियों में शामिल छात्रों को एक साल तक निलंबित किया जा सकता है। प्रस्तावित जुर्माने में छात्रों पर 5,000 रुपये और राजनीतिक संगठनों पर 10,000 रुपये का जुर्माना शामिल है।
बार-बार नियम तोड़ने पर 1 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रस्ताव है। जुर्माना नहीं भरने पर इसे बकाया माना जा सकता है और वसूली की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसके अलावा परीक्षा परिणाम रोके जाने और भारतीय न्याय संहिता व सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से बचाव अधिनियम के तहत आपराधिक कार्रवाई का भी प्रावधान प्रस्तावित है।
यूनियन ने नियमों को बताया अलोकतांत्रिक
- केरल यूनिवर्सिटी एम्प्लॉइज यूनियन ने प्रस्तावित नियमों का विरोध किया है।
- यूनियन का कहना है कि ये नियम कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों को सीमित करने की कोशिश हैं और इन्हें अलोकतांत्रिक बताया गया है।
- यूनियन ने कहा है कि नियम लागू होने पर विरोध प्रदर्शन किया जाएगा।
- यूनियन के अनुसार, ऐसी पाबंदियों से छात्र संगठनों की गतिविधियों और छात्रों की भागीदारी पर असर पड़ सकता है।
- यूनिवर्सिटी की रजिस्ट्रार रेशमी आर ने कहा कि अभी केवल नियमों का ड्राफ्ट तैयार हुआ है।
- उन्होंने बताया कि ड्राफ्ट को अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है।
- ड्राफ्ट सिंडिकेट की बैठक में चर्चा के बाद तैयार किया गया है।
- इसे एमजी यूनिवर्सिटी, कोट्टायम की आचार संहिता और हाईकोर्ट के आदेश के आधार पर तैयार किया गया है।
- अंतिम नियम छात्रों समेत सभी संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद जारी किए जाएंगे।
- रजिस्ट्रार ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित नियमों को लागू करने के लिए अभी कोई आदेश जारी नहीं हुआ है।
- विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन ने भी प्रस्तावित पाबंदियों की आलोचना की है।
विजयन ने कहा- छात्रों की राजनीतिक भागीदारी पर रोक लगाना सही नहीं
शनिवार रात एक फेसबुक पोस्ट में विजयन ने कहा कि यह फैसला उन लोगों के एजेंडे का हिस्सा लगता है जो देश भर में शुरू हुए छात्र आंदोलनों से परेशान हैं।
उन्होंने कहा, "अगर इस अलोकतांत्रिक फ़ैसले के पीछे के लोग इसे वापस नहीं लेते हैं, तो केरल में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन होना तय है।"
विजयन ने कहा कि संविधान 18 साल के हर नागरिक को वोट देने और सरकार चुनने में हिस्सा लेने का अधिकार देता है। उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई के दौरान युवाओं को राजनीतिक रूप से सोचने, संगठित होने और प्रतिक्रिया देने के अधिकार से वंचित करना असंवैधानिक है और यह पूरी तरह से राजनीति से दूर करने जैसा है। उन्होंने कहा कि आज़ादी की लड़ाई के बाद से देश के सामाजिक और राजनीतिक विकास में कैंपस और छात्र आंदोलनों ने बेमिसाल भूमिका निभाई है।
विजयन ने कैंपस में राजनीतिक चर्चा और छात्र अधिकारों की पैरवी की
उन्होंने कहा, "अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष से लेकर आजाद भारत में तानाशाही कदमों के विरोध तक, छात्र समुदाय ने हर अहम मोड़ पर सबसे आगे रहकर लड़ाई लड़ी है।"
विजयन ने कहा कि कैंपस ने कई मौकों पर देश की राजनीतिक दिशा तय करने में उत्प्रेरक का काम किया है और इतने ऐतिहासिक महत्व वाले कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक लगाने के कदम को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक समाजों को कैंपस को वैचारिक बातचीत और अधिकारों के लिए संघर्ष के केंद्रों के रूप में बनाए रखने की जरूरत है।
विजयन ने कहा, "जनता को ऐसे आदेशों के खिलाफ आगे आना चाहिए जो छात्रों के संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनते हैं।"