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शोध: समुद्र के पानी से निकलेगा यूरेनियम? आईआईएससी बंगलूरू ने खोजा इसे अलग करने का नया तरीका, कैसे करता है काम?

Mon, 07 Sep 2026 12:24 PM IST
आकाश कुमार आईएएनएस, कलकत्ता/बंगलुरू

सार

IISc Bengaluru: परमाणु ऊर्जा के लिए जरूरी यूरेनियम का बड़ा भंडार समुद्र में मौजूद है, लेकिन उसे निकालना चुनौतीपूर्ण है। आईआईएससी बंगलूरू के शोधकर्ताओं ने ऐसी झिल्ली विकसित की है, जो यूरेनियम आयनों को रोककर समुद्री जल के दूसरे आयनों को गुजरने देती है। जानें इस खोज के बारे में...
 
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IISc - फोटो : Official Website
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विस्तार
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IISc Bengaluru: भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), बंगलूरू के शोधकर्ताओं ने समुद्री जल से यूरेनियम निकालने का अधिक प्रभावी तरीका खोजा है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस तकनीक का इस्तेमाल भूजल से यूरेनियम प्रदूषण को हटाने में भी किया जा सकता है। यह खोज ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब परमाणु ऊर्जा के लिए जरूरी यूरेनियम की दीर्घकालिक उपलब्धता को लेकर दुनिया का ध्यान समुद्री जल की ओर बढ़ रहा है।

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समुद्र के पानी से यूरेनियम निकालना क्यों जरूरी है?

  • भूमि पर मौजूद यूरेनियम के भंडार तेजी से कम हो रहे हैं। इसके मुकाबले समुद्री जल में यूरेनियम की मात्रा काफी अधिक है।
  • उपलब्ध अनुमान के अनुसार, जमीन पर करीब 75 लाख टन यूरेनियम मौजूद है, जबकि समुद्री जल में करीब 450 करोड़ टन यूरेनियम होने का अनुमान है।
  • यूरेनियम परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल होता है। ऐसे में समुद्री जल से इसे प्रभावी तरीके से निकालने की तकनीक भविष्य में परमाणु ईंधन की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद कर सकती है।

समुद्री जल से यूरेनियम निकालना मुश्किल क्यों है?

  • समुद्री जल में सिर्फ यूरेनियम ही नहीं होता। इसमें कई दूसरे आयन भी बहुत अधिक मात्रा में मौजूद होते हैं।
  • यही वजह है कि समुद्री जल से केवल यूरेनियम को अलग करना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती रहा है।

अब तक कई तरह की सामग्रियां विकसित की गई हैं, जिनमें छिद्रयुक्त कार्बनिक बहुलक और विशेष नैनो पदार्थ शामिल हैं। ये सामग्रियां यूरेनियम आयनों के साथ मजबूत रासायनिक संपर्क के जरिए उन्हें पकड़ने की कोशिश करती हैं। हालांकि, समुद्री जल के जटिल रासायनिक वातावरण में यूरेनियम को दूसरे आयनों से अलग करना अभी भी मुश्किल है।

आईआईएससी के शोधकर्ताओं ने क्या नया किया?

  • आईआईएससी के भौतिकी विभाग की टीम ने इस समस्या से निपटने के लिए विशेष तरह की स्लिप्ड सहसंयोजक कार्बनिक ढांचा (सीओएफ) झिल्लियों का अध्ययन किया है।
  • शोधकर्ताओं ने पाया कि ये झिल्लियां यूरेनियम के ऑक्साइड आयनों को पूरी तरह रोक सकती हैं, जबकि समुद्री जल में मौजूद सामान्य आयनों को इनके आर-पार जाने देती हैं।

इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें केवल यूरेनियम को पकड़ने के लिए मजबूत रासायनिक संपर्क पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इसके बजाय झिल्ली की बेहद छोटी संरचनात्मक व्यवस्था के जरिए अलग-अलग आयनों की आवाजाही को नियंत्रित किया जाता है।

झिल्ली कैसे करती है यूरेनियम को अलग?

शोधकर्ताओं ने यह समझने के लिए आणविक स्तर पर अध्ययन किया कि अलग-अलग आयन झिल्ली के भीतर किस तरह आगे बढ़ते हैं। इसके लिए उन्होंने आयनों की जलयोजन संरचना, मुक्त-ऊर्जा अवरोध और झिल्ली से पैदा होने वाले घर्षण का विश्लेषण किया।
  • अध्ययन से पता चला कि सीओएफ की परतों की संरचना अलग-अलग आयनों की गति को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती है। 
  • परतों को एक-दूसरे के सापेक्ष विशेष तरीके से खिसकाने से ऐसी नैनोस्तरीय संरचना बनती है, जो यूरेनियम आयनों को रोकने में सक्षम होती है।
 

भूजल से यूरेनियम प्रदूषण हटाने में भी हो सकता है इस्तेमाल

इस शोध का महत्व केवल परमाणु ईंधन की आपूर्ति तक सीमित नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार, भूजल में यूरेनियम प्रदूषण भी एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता है। ऐसे में आयनों को चुनिंदा तरीके से अलग करने वाली यह तकनीक भूजल से यूरेनियम हटाने के लिए भी उपयोगी हो सकती है।
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आगे किस दिशा में काम आएगी यह खोज?

आईआईएससी के अनुसार, यह अध्ययन दिखाता है कि परतदार सीओएफ झिल्लियों की संरचना में बदलाव करके आयनों के गुजरने के रास्ते और उनकी ऊर्जा संबंधी बाधाओं को नियंत्रित किया जा सकता है।

शोध में उन्नत आणविक सिमुलेशन और झिल्ली की वैज्ञानिक डिजाइन को साथ इस्तेमाल किया गया है। इससे भविष्य में पर्यावरण और ऊर्जा से जुड़ी ऐसी कई चुनौतियों के लिए अधिक चुनिंदा पृथक्करण तकनीक विकसित करने का रास्ता खुल सकता है।

यह शोध योगेंद्र कुमार और बीनू वर्गीज ने आईआईएससी के प्रोफेसर प्रबल के. मैती के मार्गदर्शन में किया है। इसमें बंगलूरू स्थित एक्सेंचर लैब्स ने भी सहयोग किया।
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