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शारदा ग्रुप के हिन्दुस्तान कॉलेज में ह्यूमन वैल्यूज पर मंथन, यहां हर आदमी बना करोड़पति

Tue, 12 Jun 2018 05:55 PM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
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हिंदुस्तान कॉलेज
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हिवड़े बाजार, महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले का एक गांव है। बात 1980 की है, जब इस गांव में लोग शराब बनाया करते थे। शराब बनाना, शराब पीना और हत्या, चोरी, लूटपाट यहां आम बात हो गई थी। सभ्य लोगों का जीना मुहाल हो गया था और जो लोग अवैध धंधों में लिप्त थे, उनके परिवार भी बर्बादी की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन गांव के युवा सरपंच पोपट राव पवार ने आगे बढ़कर जिम्मेदारी ली और देखते ही देखते गांव की चौपट व्यवस्था में बदलाव आने लगा। हिवड़े बाजार आज देश के आदर्श ग्राम में गिना जाता है, इसकी सफलता की कहानी दूर-दूर तक फैली है।
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हिवड़े बाजार को सैकड़ों पुरस्कार मिल चुके हैं। आज हिवड़े बाजार में सभी परिवार करोड़पति हैं। देश-विदेश से लोग यहां आते हैं, ताकि वे गांव की खुशहाल व्यवस्था के बारे में समझ सकें। शारदा ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के प्रतिष्ठित संस्थान हिन्दुस्तान कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में ‘‘ह्यूमन वैल्यूज एंड प्रोफेशनल एथिक्स’पर 8 दिवसीय कार्यशाला का आयोजन चल रहा है। इस कार्यक्रम में 'हिवड़े बाजार' की बर्बादी से समृद्धि तक की कहानी वीडियो के माध्यम से पेश की गई।

डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी (AKTU)की ओर से नियुक्त रिसोर्स पर्सन उमेश जाधव ने ‘‘ह्यूमन वैल्यूज एंड प्रोफेशनल एथिक्स पर आयोजित कार्यशाला के छठे दिन समाज व्यवस्था पर चर्चा की। समाज में व्यवस्था स्थापित करने के लिए लक्ष्य के तौर पर जब चार आयामों को देखा गया तो इसमें पाया कि हर मानव में सही समझ हर परिवार में समृद्धि का भाव, समाज में अभय तथा प्रकृति-अस्तित्व की व्यवस्था को समझना और सह-अस्तित्वपूर्वक जीवन से ही मानव सुखी होता है।
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hindustan collage
कार्यशला में समाज व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मनोज कुमार गुप्ता ने पांच आयामों को सुनिश्चित करने पर चर्चा की। ये पांच आयाम हैं- शिक्षा-संस्कार, संयम-स्वास्थ्य, न्याय-सुरक्षा, उत्पादन-कार्य और विनिमय-कोष। इनको अगर सही समझ के साथ सुनिश्चित किया जाए तो परिवार में समृद्धि का भाव आता है।

इन पांचों आयामों के बारे में बताते हुए मनोज कुमार ने सही समझ को शिक्षा बताया और जीने के सही अंदाज को संस्कार कहा। शिक्षा-संस्कार मानव जीवन में अर्थ यह है कि वह सही समझ और योग्यता से स्वयं को जिम्मेदारी के अर्थ में देख पाए जो मानव जितना समझा है, उतना ही उसके जीने में आया है। ऐसे में जीवन को संपूर्णता के अर्थ में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि जब तक उसका सीखना सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक उसका जीवन भी सुनिश्चित नहीं होगा। मानव किसी शिक्षा को सुनकर और उसका संग्रह कर स्वयं को समझदार मानकर जीता है, जिसको वह अपने स्तर पर जांचता भी नहीं है। उसके जीने को ही उसके संस्कार के अर्थ में देखा जा सकता है और उसके संस्कार को शिक्षा से ही सुनिश्चित किया जा सकता है।

 
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hindustan collage
संयम का अर्थ बताते हुए मनोज कुमार ने बताया कि संयम का मतलब स्वास्थ सुनिश्चित करना होता है, जिससे मानव शरीर का पोषण, सुरक्षा और सदुपयोग कर सके। शरीर की सभी जरूरतों को सही समझ के साथ व्यवस्थित किया जा सकता है और एक निरोगी शरीर के साथ मानव का जीवन संभव हो पाता है। इसी प्रकार से न्याय-सुरक्षा का मतलब, हर व्यक्ति अपने कार्य व्यवहार को दूसरे व्यक्ति के साथ निश्चित आचरण में सुनिश्चित कर पाए और यह तभी संभव है, जब हर इंसान दूसरे व्यक्ति को अपने जैसा ही देखे और समझे।

उत्पादन कार्य के क्षेत्र में मानव श्रम करता है और इससे जो भी उत्पादन करता है, उसी से वह खुद का और दूसरे मानव के शरीर के पोषण सुरक्षा और सदुपयोग के प्रति जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है। इसके अर्थ में वह अपने उत्पादन को दूसरे मानव के शरीर के पोषण के लिए भी उपलब्ध कराता है। इसी तरह विनमय-कोष का अर्थ है- सही समझ के आधार पर जरूरतों को पहचानना और उत्पादन को बाजार में मानव पोषण के लिए उपलब्ध कराना, ताकि हर व्यक्ति का पोषण हो सके। इसी प्रकार से हम एक परिवार से विश्व परिवार की कल्पना को साकार कर सकते हैं।

कार्यशाला में आगे मनोज कुमार ने कहा कि समाज व्यवस्था में जब बच्चा 3 साल का होता है तो वह परिवार की मान्यताओं का अनुसरण करता है। वह परिवार के सदस्यों को आदर्श मानकर जीता है। इसी प्रकार जब 3 से 6 साल का होता है, तब वह बच्चा अनुकरण करता है यानि वह परिवार के सदस्यों के अनुशासन या आज्ञा का पालन करता है। 5 से 9 वर्ष की उम्र में बच्चा हर प्रस्ताव को सहज स्वीकृति के आधार पर जांचता है और सही प्रस्ताव को स्वीकार करता है। सही समझ के अभाव में, संबंधों की समझ न होने के चलते बच्चा परिवार में द्रोह-विद्रोह भी करता है। यही बच्चा जब समाज में जीता है तो समाजिक व्यवस्था चरमराने लगती है, इसलिए संबंधपूर्वक जीते हुए ही मानव सुखी होता है।
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