हिजाब पहनकर स्कूल जाने पर आपत्ति क्यों?
अहमदी ने कहा कि इस मामले में सरकारी आदेश का असर यह होगा कि जो लड़कियां पहले स्कूलों में जाकर सेक्युलर शिक्षा ले रही थीं, उन्हें मदरसों में वापस जाने के लिए मजबूर किया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसी को ऐसा क्यों महसूस होना चाहिए कि एक धार्मिक क्रिया किसी भी तरह से कानूनन या धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या एकता में बाधा डालेगी? अगर कोई हिजाब पहनकर स्कूल जाती है तो उससे किसी को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? अन्य छात्रों को समस्या क्यों होनी चाहिए?
अखबारों में जो लिखा है, कोर्ट उस पर नहीं चलता
वहीं, अन्य याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने तर्क दिया कि इस मामले का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि हिजाब पहनने वाले व्यक्ति के साथ धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा, इस मामले के महत्वपूर्ण होने का कारण यह है कि जब यह फैसला किया गया था, तो हेडलाइंस यह नहीं थे कि ड्रेस कोड को बरकरार रखा गया, हेडलाइंस थे कि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हिजाब को प्रतिबंधित कर दिया। इस पर पीठ ने कहा कि अखबारों में जो लिखा है, कोर्ट उस पर नहीं चलता।