गार्बर ने कहा, "यह संघर्ष कानून से परे सत्ता के इस्तेमाल का है। हमें अपने मूल्य और पहचान खुद तय करनी होगी।" उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय ने यहूदी-विरोधी भावना को दूर करने के लिए व्यापक सुधार किए हैं।
"हार्वर्ड में शिक्षण और सीखने को नियंत्रित करने और यह तय करने के लिए कि हम कैसे काम करते हैं, कानून से अलग सत्ता के दावे से ये लक्ष्य हासिल नहीं होंगे।" "हमारी कमियों को दूर करने, हमारी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने और हमारे मूल्यों को मूर्त रूप देने का काम एक समुदाय के रूप में परिभाषित और पूरा करना हमारा काम है।"
राजनीतिक दबाव या अकादमिक हस्तक्षेप?
ट्रंप प्रशासन की ये कार्रवाई केवल हार्वर्ड तक सीमित नहीं है। यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया, ब्राउन और प्रिंसटन जैसी प्रमुख संस्थाओं की फंडिंग पर भी रोक लगाई गई है। प्रशासन का आरोप है कि इन संस्थानों ने गाजा युद्ध के दौरान इज़राइल विरोधी प्रदर्शनों में बढ़ते एंटीसेमिटिज़्म को अनदेखा किया।
ट्रम्प प्रशासन की मांगों ने पूर्व छात्रों के एक समूह को विश्वविद्यालय के नेताओं को पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसमें उनसे "कानूनी रूप से विरोध करने और शैक्षणिक स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय के स्व-शासन को खतरा पहुंचाने वाली गैरकानूनी मांगों का पालन करने से इनकार करने" का आह्वान किया गया।
छात्रों, फैकल्टी और पूर्व छात्रों में आक्रोश
हार्वर्ड के छात्रों और पूर्व छात्रों में इस फैसले को लेकर जबरदस्त नाराजगी है। पूर्व छात्रा अनुरिमा भार्गव ने कहा, "हार्वर्ड आज ईमानदारी, मूल्यों और स्वतंत्रता के लिए खड़ा हुआ, जो उच्च शिक्षा की नींव के रूप में काम करते हैं।" उन्होंने आगे बताया कि हार्वर्ड ने दुनिया को याद दिलाया कि सीखना, नवाचार और परिवर्तनकारी विकास बदमाशी और सत्तावादी सनक के आगे नहीं झुकेंगे।
अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी प्रोफेसर्स (AAUP) ने शुक्रवार को ट्रंप प्रशासन के फैसले के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। उनका कहना है कि सरकार ने शीर्षक VI के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और यूनिवर्सिटी व कांग्रेस को समय रहते सूचित भी नहीं किया।