सरकार का कदम संविधान के खिलाफ
संगठन ने कहा, "यह बड़े पैमाने पर चल रहे धोखाधड़ी रैकेट को रोकने के लिए उठाया गया एक बेतुका और देशव्यापी कदम है, और खुद सरकार के ही मानने के अनुसार, यह संविधान के मुताबिक नहीं है।"
IFF ने कहा कि धारा 69A और इसके तहत बनाए गए 2009 के ब्लॉकिंग नियम सरकार को कंप्यूटर रिसोर्स पर मौजूद खास "जानकारी" तक पहुंच को ब्लॉक करने की इजाजत देते हैं। ये नियम किसी पूरे इंटरमीडियरी (मध्यस्थ प्लेटफॉर्म) को बंद करने, या किसी कंपनी को पूरे देश के लिए कोई फीचर हटाकर अपने प्रोडक्ट को फिर से डिज़ाइन करने का आदेश देने तक लागू नहीं होते हैं।
संगठन ने कहा, "श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने धारा 69A को सही ठहराया था क्योंकि यह सीमित है और इसमें प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय शामिल हैं। NTA के अपने बयान के अनुसार, लाखों लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले प्लेटफॉर्म को बंद करने के लिए इसका इस्तेमाल करना बहुत ज्यादा पाबंदी लगाने जैसा है।"
मैसेज-एडिटिंग के निर्देश के बारे में, रिलीज में कहा गया कि इसके लिए "अधिकार का कोई स्रोत नहीं" बताया गया है। संगठन ने कहा कि अगर ऐसा कोई अधिकार है, तो आदेश में इसका जिक्र होना चाहिए।
IFF का तर्क: आनुपातिकता की कसौटी पर सरकार का कदम फेल
IFF ने तर्क दिया कि सरकार के अपने बयान से ही पता चलता है कि ब्लॉक करने का कदम 'आनुपातिकता' (proportionality) की संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरा।
संगठन ने कहा, "रिलीज में दी गई बातें आपस में ही विरोधाभासी हैं। जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) और अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) के मामलों में तय की गई 'आनुपातिकता' की संवैधानिक कसौटी के अनुसार, एक्सेस पर लगाई गई पाबंदी कम से कम दखल देने वाली होनी चाहिए, साथ ही उससे मकसद भी पूरा होना चाहिए।"
NTA की रिलीज का हवाला देते हुए संगठन ने कहा कि एजेंसी के अपने बयान से पता चलता है कि उसकी नोडल एजेंसी ने "बड़ी संख्या में टेलीग्राम चैनलों, ग्रुप्स और बॉट्स को तुरंत हटाने" का काम किया था और इसी लक्षित कार्रवाई की वजह से "इन रैकेट्स से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सका है।"
IFF ने कहा, "अगर चैनल लेवल पर कार्रवाई करके नुकसान को रोका जा सकता था, तो पूरी तरह से ब्लॉक करने की बात का कोई आधार नहीं रह जाता।" उन्होंने कहा कि सरकार ने "सख्त कदम" उठाया, जबकि यह माना कि हल्के उपाय से भी काम चल रहा था।
छात्रों पर असर और परीक्षा सुरक्षा पर सवाल
IFF ने कहा कि NTA की अपनी रिलीज में माना गया है कि ब्लॉकिंग से लाखों नागरिक प्रभावित हुए, जो टेलीग्राम का इस्तेमाल शैक्षणिक, पेशेवर और निजी कामों के लिए करते हैं। संगठन का कहना है कि जब खुद यह स्वीकार किया गया कि परीक्षा प्रक्रिया सुरक्षित रही और कोई पेपर लीक नहीं हुआ, तो पूरे प्लेटफॉर्म को रोकने का आधार कमजोर हो जाता है।
IFF ने आगे कहा कि अगर समस्या सिर्फ अफवाहों तक सीमित थी, तो उसके लिए लक्षित कार्रवाई और कानूनी कदम पहले से मौजूद थे। ऐसे में पूरे प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करना उचित नहीं माना जा सकता।
संगठन ने यह भी बताया कि यह कार्रवाई NEET की तैयारी के महत्वपूर्ण दिनों में हुई, जब हजारों छात्र स्टडी ग्रुप्स और मटीरियल शेयरिंग के लिए टेलीग्राम पर निर्भर थे, जिससे उनकी पढ़ाई पर सीधा असर पड़ा।