DU's 101st Convocation Ceremony: मन में लक्ष्य बड़ा हो और कुछ कर पाने का जज्बा हो तो दिव्यांगता भी मायने नहीं रखती है। गाजियाबाद के पिलखुवा की रहने वाली मौनी ने ऐसा ही कुछ कर दिखाया है। लोकोमेटिव दिव्यांगता के कारण दोनों पैरों से लाचार होने के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अपनी हिम्मत से आगे बढ़ते हुए उन्होंने डीयू के 101वें दीक्षांत समारोह में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की।
Delhi University: डीयू के इतिहास विभाग से पीएचडी करने वाली मौनी ने बताया कि उन्हें एक साल की उम्र से लोकोमोटिव दिव्यांगता है, इस कारण से वह दोनों पैरों से ठीक से चल नहीं पाती हैं। उन्हें हैंड स्टिक का सहारा लेना पड़ता है। वह बताती हैं कि दिव्यांगता के कारण पढ़ाई को लेकर उन्होंने लोगों की बहुत बातें सुनी। उन्हें प्रोत्साहित करने की बजाए हतोत्साहित किया जाता था। उन्हें पढ़ाई की बजाए किसी तरह से नौकरी करने की बातें कही जाती। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वर्तमान में वह दिल्ली के नत्थुपूरा में रहती हैं।
पिता का सपना था डॉक्टर बने
मौनी को ऐसा लगता था कि जो लोग अच्छी शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं, उनकी जिंदगी बेहतर हो जाती है। मेरे पिता का सपना था कि घर में से कोई डॉक्टर बने। इसलिए मैंने पीएचडी में जाना चुना। इसके लिए मैंने कड़ी मेहनत की। अपनी दिव्यांगता को कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।
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सबके तानों और बातों को अनसुना करते हुए मैंने पीएचडी प्रवेश परीक्षा, साक्षात्कार को पास किया। इसमें मेरे विभाग के शिक्षकों ने काफी हौंसला बढ़ाया। मेरी आर्थिक रूप से भी मदद की, मेरी फीस व हॉस्टल की फीस का भुगतान भी किया।
निराशा को पीछे छोड़कर बढ़ीं आगे
एक बार अपनी दिव्यांगता के कारण अपने को कमतर भी पाया, ऐसा लगा कि सब क्षेत्रों में सामान्य लोगों को ही प्राथमिकता मिलती है। लेकिन हिम्मत न हारते हुए बस आगे बढ़ती रही और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। मौनी ने 2018 में पीएचडी में दाखिला लिया और 2024 में अपनी पीएचडी जमा कर दी। अब वह शैक्षणिक क्षेत्र में ही आगे बढ़ना चाहती हैं।