कार्यकारी परिषद की बैठक में क्या मांग उठी?
- कार्यकारी परिषद की आपात बैठक में सदस्य राजपाल सिंह पवार ने छात्रावासों की संख्या बढ़ाने का समर्थन किया। लेकिन उन्होंने इसके लिए एचईएफए से कर्ज लेने का विरोध किया।
- पवार ने मांग की कि शुरुआत में 1,250 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराई जाए। इसके बाद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रावासों के निर्माण के लिए अतिरिक्त धन जुटाने के प्रयास किए जाएं।
कार्यकारी परिषद के एक सदस्य के अनुसार, पवार ने इस बात पर जोर दिया कि परियोजनाओं के लिए कर्ज के बजाय सरकारी अनुदान लिया जाना चाहिए। शिक्षकों के साथ साझा किए गए एक पत्र के अनुसार, इसके बाद परिषद ने सरकारी अनुदान जुटाने पर सहमति जताई। बैठक के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी कथित तौर पर एचईएफए के कर्ज की अदायगी को लेकर चिंता जताई।
वित्त समिति ने निर्माण कार्यों को लेकर क्या सुझाव दिए?
इससे पहले वित्त समिति की बैठक में समिति के सदस्य जेएल गुप्ता ने छात्रावास निर्माण से जुड़ी भवन समिति की सिफारिशों पर अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत की थीं। गुप्ता ने छात्रावासों के विस्तार का स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए खुली और प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया अपनाने की मांग की।
उनका कहना था कि इन परियोजनाओं में सार्वजनिक धन की बड़ी राशि खर्च होगी। इसलिए वित्तीय निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए। इस मांग का मुख्य उद्देश्य निर्माण कार्यों में पारदर्शिता बनाए रखना और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर उचित निगरानी सुनिश्चित करना है।
शिक्षकों को कर्ज चुकाने के बोझ की चिंता क्यों है?
किरोड़ीमल कॉलेज में अंग्रेजी के सहायक प्रोफेसर रुद्राशीष चक्रवर्ती ने भी छात्रावास निर्माण के लिए एचईएफए से कर्ज लेने पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि कर्ज का मूलधन और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी भविष्य में विद्यार्थियों पर आर्थिक दबाव डाल सकती है। इस कारण आने वाली पीढ़ियों के छात्रों को इसका बोझ उठाना पड़ सकता है।
चक्रवर्ती ने सरकारी अनुदान को इसके विकल्प के रूप में पेश किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग वर्ष 1956 से अनुदान देने की व्यवस्था का इस्तेमाल करता रहा है। उनके अनुसार, इस माध्यम से छात्रावासों के लिए धन जुटाया जा सकता है और विद्यार्थियों पर कर्ज चुकाने का बोझ डालने से बचा जा सकता है।
सत्य निकेतन हादसे के बाद छात्रावासों की जरूरत पर बढ़ा जोर
चक्रवर्ती ने छात्रावास विस्तार की योजना की तात्कालिकता को 6 सितंबर को दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के सत्य निकेतन में हुई इमारत दुर्घटना से भी जोड़ा। इस हादसे में सात लोगों की मौत हुई थी। घटना के बाद विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था और उनकी सुरक्षा से जुड़े सवाल प्रमुखता से सामने आए।
छात्रावासों की उपलब्धता बढ़ाने का उद्देश्य अधिक विद्यार्थियों को रहने की सुविधा देना है। हालांकि, शिक्षकों का कहना है कि इस जरूरत को पूरा करने के लिए वित्तीय व्यवस्था भी ऐसी होनी चाहिए, जिससे भविष्य में विद्यार्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव न पड़े।
5,889 करोड़ रुपये की योजना में कितने छात्रावास बनेंगे?
कार्यकारी परिषद से मंजूर योजना के तहत नए छात्रावासों के निर्माण और दो पुराने छात्रावासों के पुनर्निर्माण पर कुल 5,889 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
| निर्माण कार्य |
अनुमानित लागत |
विद्यार्थियों के लिए क्षमता |
| नए छात्रावासों का निर्माण |
4,027 करोड़ रुपये |
15,758 |
| जुबली हॉल और स्नातकोत्तर पुरुष छात्रावास का पुनर्निर्माण |
1,862 करोड़ रुपये |
6,137 |
| कुल |
5,889 करोड़ रुपये |
21,895 |
योजना के तहत नए छात्रावासों में 15,758 विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था होगी। वहीं, जुबली हॉल और स्नातकोत्तर पुरुष छात्रावास के पुनर्निर्माण से 6,137 विद्यार्थियों के लिए आवास उपलब्ध कराने की योजना है। इस तरह दोनों निर्माण कार्य पूरे होने के बाद कुल 21,895 विद्यार्थियों के लिए रहने की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में कहां बनाए जाएंगे नए छात्रावास?
योजना के तहत विश्वविद्यालय के कई परिसरों में छात्रावास संबंधी निर्माण कार्य किए जाएंगे। इनमें प्रमुख स्थान हैं:
- विश्वविद्यालय का ढाका कॉम्प्लेक्स परिसर
- सूरजमल विहार परिसर
- नजफगढ़ परिसर
- द्वारका स्थित पश्चिमी परिसर
इन स्थानों पर प्रस्तावित निर्माण का उद्देश्य विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के लिए आवास की उपलब्धता बढ़ाना है।