पुरानी व्यवस्था के मुताबिक अभी तक प्रैक्टिकल संबंधित स्कूल में ही करवाए जाते थे, लेकिन अब थ्योरी की तर्ज पर ही प्रैक्टिकल को भी दूसरे केंद्र पर करवाने पर विचार हो रहा है। थ्योरी व प्र्रैक्टिकल दोनों के सेंटर एक ही जगह रखे जाएंगे। सत्र 2019-2020 से ही नई व्यवस्था को लागू करने पर विचार चल रहा है।
कुछ स्कूलों में प्रैक्टिकल करवाने के लिए लैबोरेटरी और पर्याप्त साधन नहीं होने की वजह से बोर्ड इसपर विचार कर रहा है। इसके साथ ही प्रैक्टिकल की मार्किंग स्कीम में भी बदलाव किया जा सकता है। प्रैक्टिकल के लिए एडमिट कार्ड भी दिए जाएंगे।
स्कूलों में चरमरा जाएगी शिक्षण व्यवस्था
स्कूल प्रबंधन की मानें तो नई व्यवस्था से स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था चरमरा जाएगी। स्कूलों में बच्चों की क्षमता के मुताबिक ही फिजिक्स, केमिस्ट्री और बॉयोलॉजी की लैब और उपकरण मौजूद हैं। अगर किसी विद्यालय को प्रैक्टिकल के लिए केंद्र बनाया जाएगा तो वहां सीमित संसाधनों में इसे कराना चुनौतीपूर्ण होगा। मसलन एक लैब में एक बार में 20-25 बच्चों के बैच का ही प्रैक्टिकल कराया जताया है। बोर्ड अगर थ्योरी की तर्ज पर प्रैक्टिकल के भी 22 केंद्र बनाता है तो हर केंद्र पर 1000 से अधिक विद्यार्थियों का प्रैक्टिकल होगा। यानी एक बैच के मुताबिक एक हजार बच्चों के एक विषय का ही प्रैक्टिकल 20-25 दिन तक चलेगा। केंद्र बनाए गए स्कूल में प्रैक्टिकल पूरा करने में महीनों लग जाएंगे। ऐसे में उस स्कूल की शिक्षण व्यवस्था बेपटरी हो जाएगी। उसके अलावा संसाधनों का खर्च कौन उठाएगा, ये भी अभी स्पष्ट नहीं है।
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