क्या था रोबोटिक स्कैनर का नियम?
दिग्विजय सिंह ने अपने पोस्ट में दावा किया कि सीबीएसई ने ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) के लिए जो शुरुआती 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (RFP यानी निविदा/टेंडर आमंत्रण दस्तावेज) तैयार किया था, उसमें कॉपियों की स्कैनिंग के लिए 'रोबोटिक स्कैनर' का उपयोग करने का नियम तय किया गया था। लेकिन बाद में इस महत्वपूर्ण तकनीकी शर्त को बदलकर वहां साधारण स्कैनर (Ordinary Scanner) के इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई।
उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा कि आखिर ऐसा क्यों किया गया? इसका जवाब सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ही दे सकते हैं।
समझाया क्या होता है रोबोटिक स्कैनर?
संसदीय समिति के अध्यक्ष ने अपने पोस्ट के माध्यम से आम पाठकों को यह भी समझाया कि 'रोबोटिक स्कैनर' आखिर क्या बला है और यह क्यों जरूरी था। उन्होंने लिखा, 'एक रोबोटिक स्कैनर असल में 3D या ऑप्टिकल स्कैनर का ही एक रूप होता है, जो एक स्वचालित रोबोटिक आर्म (या इसी तरह की ऑटोमैटिक तकनीक) के साथ मिलकर काम करता है। इसकी मदद से बिना इंसानी हाथों को लगाए (hands-free) बेहद सटीकता के साथ बल्क में कॉपियों या दस्तावेजों को स्कैन और डिजिटल किया जा सकता है।'
उन्होंने आगे बताया कि इस तरह की आधुनिक प्रणालियों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियों में ऑटोमेटेड क्वालिटी कंट्रोल के लिए, बड़ी लाइब्रेरी में किताबों को डिजिटल रूप में सहेजने (बल्क आर्काइवल डिजिटाइजिंग) और रिवर्स इंजीनियरिंग जैसे जटिल कामों के लिए किया जाता है।

वेंडर को फायदा पहुंचाने का आरोप
इस आधुनिक तकनीक को टेंडर से हटाकर साधारण स्कैनर को शामिल करने पर तंज कसते हुए कांग्रेस सांसद ने पूछा कि आखिर इस नियम को क्यों बदला गया? क्या ऐसा किसी एक चुनिंदा वेंडर (ठेका लेने वाली कंपनी) को उपकृत करने या फायदा पहुंचाने के लिए किया गया? उन्होंने अंत में जनता पर छोड़ते हुए लिखा, 'इसका फैसला आप खुद करें।'
गौरतलब है कि सीबीएसई की 12वीं की उत्तर पुस्तिकाओं की डिजिटल चेकिंग में आ रही गड़बड़ियों को लेकर छात्र और विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं और संसदीय समिति भी इस पूरे मामले की बारीकी से जांच कर रही है।