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रंग लाई मेहनत, पोलैंड में देश का नाम करेगा रोशन कस्बे का लड़का

Mon, 18 Jul 2016 11:28 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला
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तरुण अग्रवाल - फोटो : GLA
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अगर आप कभी यूपी में मथुरा से अलीगढ़ जाएं , तो एक छोटा सा क़स्बा इगलास रास्ते में पड़ता है। यहां की चम-चम भी बहुत मशहूर है। इगलास की चम चम की मिठास जिसकी ज़बान पर एक बार लग जाए वो बार बार वहाँ लौटता है। मगर ये मिठास का राज़ और प्रसिद्धि आस पास के इलाकों तक ही सीमित है।
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लेकिन क्रेज ऐसा कि हर आती-जाती बस इगलास में रुक कर यहां की मिठाई चखे बगैर नहीं जाती होगी। इगलास के इस छोटे से वजूद को कुछ नया मिल गया है। यकीनन अब इस जगह को सारी दुनिया जान जाएगी क्यूंकि अब इस कस्‍बे को नयी पहचान मिल गयी है।

इस नयी पहचान का नाम है तरुण अग्रवाल, जो यहां का एक लोकल युवक है। तरुण महज़ 22 साल के हैं मगर इरादे हिमालय से ऊँचे। तरुण की कहानी इगलास से ही शुरु होती है। स्कूल की पढाई के बाद, हर बच्चे की तरह तरुण ने भी अपने सुंदर भविष्य के सपने पिरोये थे।  
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उन्होंने बारहवीं के बाद देश के कई नामी कॉलेजों में अपने दाखिले के लिए एंट्रेंस टेस्ट दिया। पढ़ाई-लिखाई में हमेशा से चतुर तरुण का चयन कॉलेज ऑफ एंजियनियरिंग रुड़की के लिए हो भी गया था। लेकिन उन्होंने कुछ पारिवारिक परिस्थितयों के रहते ये फैसला लिया कि वो अपने घर के पास किसी टॉप युनिवर्सिटी में पढ़ें तो बेहतर होगा।

फौलादी इरादे रखने वाले जीवन में रुकते कहाँ हैं। उनके ही इलाके में जब जीएलए यूनिवर्सिटी के मथुरा कैंपस जैसा अग्रणी संस्‍थान था तो उन्हें घर से दूर जाने की क्या जरूरत थी। जीएलए युनिवर्सिटी का इलेक्ट्रॉनिक एंड कंम्यूनिकेशन विभाग विश्वसनीय है। अगले ही कुछ रोज़ में उन्होंने जीएलए यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस टेस्ट दिया।

उनका परिश्रम और तैयारी फिर काम आई और जीएलए में तरुण को एडमिशन मिल गया। फिर शुरुआत हुई उनकी जीवन के एक ऐसे चरण की जिसमें उन्होंने अर्जुन की तरह एकाग्रता से परिश्रम किया। मथुरा के इस कैंपस में तरुण ने जमकर मेहनत की और साथ-साथ खुद को प्लेसमेंट के ‌लिए तैयार भी किया।

यह चार साल कब गुज़र गए पता ही ना चला। इन चार सालों ने जैसे उनके अंदर एक अलग सा तेज और भिन्न सी प्रतिभा का संचार किया। तरुण को हमेशा से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंम्यूनिकेशन इंजिनियरिंग में रुचि थी। उन्होंने इस फील्ड में खुद को चैंपियन बना लिया था।

यूनिवर्सिटी के चार साल खत्म हुए और प्लेसमेंट ड्राइव का सीजन शुरू हो गया। अन्य बच्चों की तरह तरुण ने भी आठ कंपनियों के प्लेसमेंट राउंड में बैठे। किस्मत हर बार साथ नहीं देती और ठीक ऐसा ही हुआ तरूण के साथ। आठ में से किसी एक कंपनी में भी तरुण अपनी जगह नहीं बना पाए।

तरुण ने इस दौर का भी हिम्मत से सामना किया और ज़िन्दगी की मजबूरों के रहते मंज़िलों से समझौता नहीं किया। करियर को लेकर तरुण की सोच एकदम साफ थी। वो ना तो सेल्स संबंधी कंपनी में जाना चाहते थे और ना ही किसी आईटी कंपनी में। उनका मन किसी कोर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कंम्यूनिकेशन इंजिनियरिंग में ही जाने का था।

इसी बीच पता चला की जीएलए के कैंपस में यूफलेक्स का आना निश्चित हुआ है। तरुण के लिए जैसे मंज़िल सामने आकर कड़ी हो गयी हो, मगर फिर भी कितनी दूर। यूफलेक्स का रिटन एग्जाम काफी मुश्किल था। उन्हें लग ही नहीं रहा था कि वो इस कठिन परीक्षा को अपने लिए मुमकिन कर पाएंगे।

फिर उन्होंने एकाग्रता से लंबी सांस ली तो महसूस किया जैसी उनकी पिछली गुजरी हुई जिंदगी, उनका वर्षों का परिश्रम, जीएलए में बिताए चार साल सभी इसी पल की तैयारी में तो गुजरे थे। आत्मविश्वास फिर जगा और मन लगा के उन्होंने अपना कर्म किया।

अब थी फल की बारी जो इगलास की चम-चम की तरह बिल्कुल मीठा था। इंटव्यू के कई दौर चले। पहले कैंपस में , फिर नॉयडा के दफ्तर में। हर इंटरव्यू के साथ सोना जैसे और खरा होता गया।

तरूण की प्रोफाइल कंपनी को इतनी पसंद आई कि चयनकर्ताओं ने उनका नाम सीधे पोलैंड की शाखा के लिए चुन लिया। अब जीएलए युनिवर्सिटी का ये छात्र इगलास की महक और मिठास पोलैंड तक ले जाएगा।
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