'बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड अगर मुझे फेल न करता तो आज हम भी कोटा में भइया के साथ मेडिकल की तैयारी कर रहे होते। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के किसी कर्मचारी की बेईमानी ने मेरा एक साल बर्बाद कर दिया।'
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पेंटिंग का शौक रखने वाली 14 साल की प्रियंका सिंह से उनकी किस्मत ने जिंदगी ने सारे खुशनुमा रंग छीन लेने की कोशिश चार महीने पहले की थी। लेकिन कोमल सी दिखने वाली और बातचीत में बचपने से लबरेज इस लड़की ने अपनी लड़ाई लड़ी और जीती भी। प्रियंका सिंह यानी सहरसा के सिमरी बख्तियारपुर की सिटानाबाद पंचायत के गंगा टोला की एक आम सी लड़की।
हाई कोर्ट का फैसला
बीते 22 जून को बिहार बोर्ड की दसवीं की छात्रा प्रियंका फेल हो गई थी। जिसके बाद उसने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट की दखलंदाजी के बाद प्रियंका की कॉपियां दोबारा जांची गईं। नतीजे में प्रियंका उत्तीर्ण घोषित हुई।
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हाई कोर्ट ने बिहार बोर्ड को प्रियंका को पांच लाख रुपये जुर्माना देने का आदेश भी दिया है। अचानक अखबार, टीवी और वेब पोर्टल्स की सुर्खियां बनी प्रियंका बताती हैं, 'जब नतीजे आए तो मैं फेल थी। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। पापा, टीचर, दोस्त सबने कहा कि बहुत बुरा हुआ। मैं बहुत निराश हो गई थी जिस पर पापा ने समझाया कि मुझे अपनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी और मुझे न्याय भी मिलेगा। ये पापा और दोस्तों का मुझ पर विश्वास की जीत है।'
डॉक्टर बनने का सपना
- फोटो : BBC
डीडी हाई स्कूल सरडीहा (सहरसा) की छात्रा प्रियंका कक्षा नौवीं में अपनी क्लास में अव्वल आई थीं। उन्हें उम्मीद थी कि बिहार बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में वो टॉप टेन में होंगी। स्कूल में शिवांगी और सोनी के साथ उसका कम्पीटीशन रहता था। ये दोनों प्रियंका की सहेलियां भी हैं। शिवांगी फिलहाल पटना में और सोनी कोटा में रहकर मेडिकल की तैयारी कर रही हैं।
प्रियंका कहती है, 'अगर मेरे साथ ऐसा ना हुआ होता, तो मैं भी अपने डॉक्टर बनने के सपने को पूरा करने की तरफ कदम बढ़ा रही होती। लेकिन मुझे इस बात की खुशी भी है कि मेरी लड़ाई कई छात्रों के लिए मिसाल बनेगी। मेरी लड़ाई के नतीजे में ये नियम भी बना कि पुर्नमूल्यांकन में कॉपियों में मिले नंबरों को सिर्फ जोड़ना ही नही बल्कि जांचना भी होगा। ये भविष्य के छात्रों के लिए बहुत अच्छी बात है।'
प्रियंका का केस
रोजाना आठ घंटे पढ़ने वाली प्रियंका के पिता राजीव सिंह सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। उनका भाई कोटा में रहकर मेडिकल की तैयारी कर रहा है। रिजल्ट गड़बड़ होने के चलते प्रियंका को कहीं दाखिला नहीं मिला है लेकिन प्रियंका ने पढ़ाई से जुड़ा अपना अनुशासन नहीं छोड़ा है।
वो बताती हैं, 'पापा ने मुझे एनसीआरटी की ग्यारहवीं की किताब ला कर दे दी है और मैं घर पर रहकर अपनी पढ़ाई कर रही हूं। पापा मुझे पढ़ाते हैं और मेरी कोशिश है कि पढ़ाई की मेरी लय बनी रहे।'
हाईकोर्ट में प्रियंका का केस लड़ने वाले रतन कुमार कहते हैं, 'प्रियंका आपको पहली नजर में बहुत सीधी-साधी लड़की लगेगी लेकिन जब वो पढ़ाई को लेकर बोलना शुरू करेगी तब आपको उसकी योग्यता और आत्मविश्वास का अंदाजा मिलेगा।'
बता दें कि हाई कोर्ट में प्रियंका ने अपनी कॉपियां दिखाने की मांग रखी थी जिसके लिए प्रियंका के परिवार को 40,000 रुपये जमा करने थे। शर्त ये भी थी कि अगर प्रियंका का दावा गलत साबित होगा तो ये रुपये वापस नहीं किए जाएंगे।
प्रियंका के पिता राजीव सिंह उस लम्हे को याद करते हुए कहते हैं, 'हमारे जैसे सामान्य परिवार के लिए 40 हजार की रकम छोटी नहीं है। लेकिन बेटी पर विश्वास के आगे सब कुछ बौना लगा। वकील साहब तक से हमने मदद ली और 40 हजार कोर्ट में जमा किए।'
दिलचस्प है कि अब प्रियंका को 5 लाख रुपये बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड जुर्माने के तौर पर तीन माह के अंदर देगा। पिता राजीव कहते हैं, 'उस पैसे को प्रियंका की शिक्षा में ही लगाया जाएगा।'
क्या बिहार बोर्ड की व्यवस्था पर गुस्सा आता है, इस सवाल के जवाब में प्रियंका कहती हैं, 'बारकोडिंग की व्यवस्था तो इसलिए की गई थी कि कोई पैरवी न हो पाए। ये तो अच्छा था, लेकिन बिहार बोर्ड के कर्मचारी बेईमान हैं तो सरकार क्या करेगी। मुख्यमंत्री जी तो अच्छे हैं। उन्होंने लड़कियों को साइकिल, गांव में बिजली, सड़क बनवाकर आगे ही बढ़ाया है। फिर भी बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के कर्मचारी ऐसा करेंगे तो बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।'