आज की बदलती दुनिया में भूतकाल के अध्ययन में भी बेहतर भविष्य है। जब अतीत के पन्नों को पलटा जाता है, तो उससे संबंधित साक्ष्य दुर्लभ पांडुलिपियों, प्राचीन सिक्कों, मंदिरों, मूर्तियों आदि के रूप में सामने आते हैं। इनसे यह जानने में मदद मिलती है कि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा आदि गुजरी हुई सभ्यताओं का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक ढांचा कैसा था और समय बीतने के साथ इसमें क्या बदलाव आए। बीते कल की खोज पर निकलने, प्राचीन काल में मिलने वाली वस्तुओं को सहेजने तथा उनकी मदद से अतीत की कड़ियों को फिर से जोडऩे का एक अलग ही मजा है। गौरतलब है कि प्राचीन सभ्यताओं के बारे में जो कुछ हम जान पाए हैं, उसका श्रेय इतिहास और इससे संबंधित ज्ञान के क्षेत्रों जैसे आर्कियोलॉजी, आर्काइव्स मैनेजमेंट, म्यूजियोलॉजी को जाता है।
विषय का स्वरूप
हैरिटेज मैनेजमेंट एक ऐसा इंटरडिसिप्लनरी विषय है, जिसमें रसायन, एंथ्रोपोलॉजी और भूगर्भ विज्ञान की जानकारी भी आवश्यक होती है। हैरिटेज मैनेजमेंट के अंतर्गत पुरातात्विक महत्व वाली जगहों का अध्ययन एवं प्रबंधन किया जाता है। इसके अलावा पुरातात्विक स्थलों की खुदाई का कार्य संचालित किया जाता है तथा इस दौरान मिलने वाली वस्तुओं को संरक्षित कर उनकी उपयोगिता का निर्धारण किया जाता है। इसकी सहायता से घटनाओं का समय, क्रम आदि के बारे में जरूरी निष्कर्ष निकाले जाते हैं। यही जानकारियां आगे चलकर ऐतिहासिक साक्ष्य बनती हैं।
विशेषज्ञता है फायदेमंद
हैरिटेज मैनेजमेंट में भविष्य बनाने के इच्छुक युवा किसी एक चुने हुए क्षेत्र में विशेषज्ञता भी ले सकते हैं। उदाहरण के लिए, न्यूमिसमैटिस्ट का कार्य जहां पुराने सिक्कों का अध्ययन करना है, वहीं एपिग्राफिस्ट के तौर पर प्राचीन लिपियों का अध्ययन तथा विश्लेषण किया जा सकता है। एक अन्य विकल्प आर्काइविस्ट बनने का भी है। इसके अंतर्गत पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं का अध्ययन कर उन्हें व्यवस्थित तरीके से सूचीबद्ध किया जाता है। इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण जानकारियों को सुरक्षित रखना है, ताकि बाद में जरूरत पडऩे पर उनका उपयोग किया जा सके। इनमें ऐतिहासिक महत्व के दस्तावेज, नक्शे, फोटो, फिल्में, खनिज, वैज्ञानिक उपकरण आदि चीजें शामिल होती हैं। इस क्षेत्र में एक अन्य विकल्प हिस्टोरियन (इतिहासवेत्ता) बनने का भी है। शिक्षण और शोध के अलावा इनका काम ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या और विश्लेषण करना भी होता है।
कोर्स और शैक्षणिक योग्यता
लगभग सभी विश्वविद्यालयों में इतिहास में बीए, एमए तथा पीएचडी कोर्स की सुविधा उपलब्ध है। इसके बाद स्पेशलाइज्ड कोर्स करना फायदेमंद रहता है। दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी से हैरिटेज मैनेजमेंट तथा आर्कियोलॉजी में 2 साल का पीजी डिप्लोमा कोर्स किया जा सकता है। पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए आवश्यक है कि आपने आर्कियोलॉजी या एंथ्रोपोलॉजी से एमए किया हो या फिर आपके पास प्राचीन या मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मास्टर डिग्री हो। एमए में कम-से-कम 55 प्रतिशत अंक होने चाहिए।
अवसर कहां-कहां
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, नई दिल्ली और राज्यों में स्थित इसके क्षेत्रीय केंद्र, विभिन्न संग्रहालय, कला दीर्घाएं, एनजीओ व विश्वविद्यालय, विदेश मंत्रालय की हिस्टोरिकल डिवीजन, शिक्षा मंत्रालय, पर्यटन मंत्रालय, फिल्म्स डिवीजन, इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च, भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार आदि जगहों पर इस क्षेत्र के प्रोफेशनल मौके पाते हैं।
प्रमुख संस्थान
नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया, जनपथ, नई दिल्ली
इंस्टीट्यूट ऑफ आर्कियोलॉजी, लालकिला, नई दिल्ली
इंस्टीट्यूट ऑफ हैरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट, 18-ए, कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली
नेशनल म्यूजियम इंस्टीट्यूट, नेशनल म्यूजियम कैम्पस, जनपथ, नई दिल्ली
डॉ. जयंतीलाल भंडारी
कॅरियर दिशानिर्देशक