डिजिटल डिटॉक्स की ओर
सर्वे बताते हैं कि भारतीय युवा खासकर जेन-जी अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बेहद सजग है। यह युवा अपनी सेहत के लिए गैर-हानिकारक विकल्प अपना रहा है। सोशल मीडिया के दीवानेपन के दौर में भी खुद की निजता बनाए रखने की समझ ही है कि आज का युवा स्क्रीन टाइम और स्क्रॉलिंग के व्यूह को तोड़कर ‘डिजिटल डिटॉक्स’ जैसी अवधारणाओं की ओर बढ़ रहा है।
योग और आयुर्वेद के प्रति आकर्षण असाधारण तरीके से बढ़ा है। वीकेंड पर ‘भजन क्लबिंग’, ऑफिस ब्रेक में मेडिटेशन, तीर्थों की सोलो ट्रिप ब्लॉगिंग और अपने गांव, कस्बे, शहर की लोक कला की समझ जैसी प्रवृत्तियां, भारतीय युवाओं की सांस्कृतिक सजगता और परिपक्वता की एक नई कहानी गढ़ रही हैं।
अपनी भाषा का आत्मविश्वास
इस परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण संकेत युवाओं की भाषा-संबंधी चेतना में भी दिखाई देता है। मातृभाषा में सोचने और अभिव्यक्त करने की आजादी को वह किसी झिझक के साथ नहीं, बल्कि वैचारिक स्वाभिमान व आत्मविश्वास के साथ अपनाता है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कंटेंट, स्टार्टअप, पॉडकास्ट और रचनात्मक प्रयोग इस बदलाव के स्पष्ट संकेत हैं।
भाषा के प्रति सजगता और सरोकार का आलम यह है कि अपनी भाषा और बोली को लेकर जो झिझक कभी मिलेनियल्स ने महसूस की होगी, वह जेन-जी के लिए एक समझ से बाहर की बात है।
संस्कृति का सवाल
संस्कृति के प्रश्न पर भी आज का युवा एक संतुलित दृष्टि के साथ खड़ा है। वह संस्कृति को बोझिल परंपरा नहीं, बल्कि निरंतरता के रूप में देखता है, उस पर गर्व करता है और भाषायी-सांस्कृतिक चेतना को जमीनी स्तर पर जीवंत बनाए रखता है।
लोक संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति बढ़ती रुचि इस बात का प्रमाण है कि परंपरा और आधुनिकता के बीच टकराव नहीं, बल्कि संवाद संभव भी है और साध्य भी। वेद के मंत्र- ‘आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वतः’ और ‘संगच्छध्वं संवदध्वं’ भारतीय युवा चेतना के प्रेरक सूत्र बने रहेंगे, ऐसा विश्वास है।