मामला कहां से शुरू हुआ?
- यह मामला सीबीएसई कक्षा 10वीं के एक विद्यार्थी की आरटीआई याचिका से जुड़ा है।
- विद्यार्थी ने महंगी पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया के कारण आरटीआई अधिनियम के तहत अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां मांगी थीं।
विद्यार्थी ने कक्षा 10 गणित मानक के सेट-3 के प्रश्नपत्र की कठिनाई, अंक निर्धारण में अपनाई गई मॉडरेशन नीति और अपनी उत्तर पुस्तिका में काटे गए अंकों को लेकर भी सवाल उठाए थे।
सीबीएसई ने उत्तर पुस्तिका की प्रति कैसे दी?
सीबीएसई के केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने 2 जुलाई 2025 को विद्यार्थी को बताया कि निर्धारित शुल्क मिलने के बाद मांगी गई उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां ईमेल के जरिए भेज दी गई थीं।
इसके बाद विद्यार्थी ने प्रथम अपील दायर की। उसने उत्तर पुस्तिका के कुछ खाली पन्नों, गणित में मॉडरेशन नीति और अपनी उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन से जुड़े सवाल उठाए।
प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने कहा कि ये मुद्दे मूल आरटीआई आवेदन में पूछी गई जानकारी से अलग हैं और इनके लिए अलग स्पष्टीकरण तथा विश्लेषण की जरूरत है।
सीबीएसई के किस नियम पर सीआईसी ने जताई आपत्ति?
सुनवाई के दौरान सीबीएसई के सीपीआईओ ने 19 मई 2025 के बोर्ड के परिपत्र का हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि विद्यार्थी आरटीआई अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिका की प्रति प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन इसी अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिका के सत्यापन या पुनर्मूल्यांकन का अनुरोध नहीं किया जा सकता।
सीआईसी ने इस प्रावधान पर आपत्ति जताई। आयोग ने कहा कि सिर्फ इसलिए किसी विद्यार्थी को पुनर्मूल्यांकन से रोकना कि उसने आरटीआई के जरिए अपनी उत्तर पुस्तिका हासिल की है, आरटीआई अधिनियम और उसके नियमों की भावना के अनुरूप नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के किस फैसले का दिया हवाला?
सीआईसी ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 11 अप्रैल 2019 के आईसीएसआई बनाम पारस जैन मामले के फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में कहा गया था कि किसी संस्थान के दिशा-निर्देशों के तहत उपलब्ध विकल्प और आरटीआई कानून के तहत उपलब्ध अधिकार एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं।
यानी किसी विद्यार्थी को किसी संस्थान के नियमों के तहत उपलब्ध उपाय अपनाने से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने आरटीआई का भी सहारा लिया है।