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रोचक तथ्य: आजादी से पहले देश के बाहर बनी थी भारत की अस्थाई सरकार, किसने-कब और कहां किया था गठन? जानें इतिहास

Wed, 21 Oct 2026 06:00 AM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

जब भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के लिए संघर्ष कर रहा था, तब देश की आजादी का सपना लेकर विदेश की धरती पर भी एक सरकार बनाई गई थी। इस सरकार का मकसद सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देना नहीं, बल्कि दुनिया के सामने स्वतंत्र भारत की सरकार का विचार रखना भी था। इसका गठन किस देश में हुआ था, किसने और कब किया था? जानें पूरा इतिहास...
 
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Azad Hind Government Anniversary - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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आजादी की लड़ाई का जिक्र होते ही हमारे मन में देश के भीतर हुए आंदोलन, जुलूस और क्रांतिकारियों के संघर्ष की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजों से भारत की आजादी की लड़ाई के बीच देश से बाहर भी एक सरकार बनाई गई थी? नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में बनी इस अस्थायी सरकार की कहानी बेहद दिलचस्प है। आखिर इसका गठन कब और कहां हुआ था? इसमें कौन-कौन शामिल था और इसे किन देशों की मान्यता मिली थी? आइए जानते हैं आजादी की लड़ाई के इस खास अध्याय के बारे में।

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आजाद हिंद सरकार का गठन कब हुआ था?

आजाद हिंद सरकार का गठन 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में हुआ था। इसे आजाद हिंद की अस्थायी सरकार (Provisional Government of Free India) के नाम से जाना गया। नेताजी इस सरकार के प्रमुख थे और उन्होंने भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लक्ष्य के साथ इसकी स्थापना की थी। यह भारत के बाहर स्वतंत्रता आंदोलन के तहत बनी निर्वासित सरकार थी। 

इस सरकार का गठन ऐसे समय में हुआ, जब द्वितीय विश्व युद्ध जारी था। नेताजी ने विदेश में रह रहे भारतीयों और आजाद हिंद फौज के सहयोग से स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढ़ाने की कोशिश की। 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में इसकी घोषणा के बाद सरकार ने 11 मंत्रियों और आजाद हिंद फौज के 8 प्रतिनिधियों के साथ काम करना शुरू किया था। इस घटना से आजादी की लड़ाई को एक राजनीतिक स्वरूप देने का प्रयास भी सामने आया। 

कितने देशों ने दी थी आजाद हिंद सरकार को मान्यता?

आजाद हिंद सरकार के इतिहास का एक अहम पहलू इसे मिली अंतरराष्ट्रीय मान्यता है। सबसे पहले जापान ने 23 अक्तूबर 1943 को सबसे पहले इस सरकार को मान्यता दी थी। इसके बाद जर्मनी, फिलीपींस, थाईलैंड, मंचूरिया और क्रोएशिया जैसे देशों ने भी इसे मान्यता दी थी। इस तरह इसे मान्यता देने वाले देशों और तत्कालीन शासन-व्यवस्थाओं की संख्या नौ बताई जाती है। 

आजाद हिंद बैंक की स्थापना और अपनी करेंसी

आजाद हिंद सरकार की खास बात यह थी कि उसने केवल स्वतंत्र भारत का विचार सामने नहीं रखा, बल्कि अपने प्रशासनिक और आर्थिक ढांचे को भी आकार देने की कोशिश की। इस सरकार ने अपना बैंक, करेंसी और डाक टिकट भी शुरू किए थे। 

नेताजी ने 1944 में बर्मा (अब म्यांमार) के रंगून में आजाद हिंद बैंक की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य भारत की आजादी के लिए जुटाए गए धन का प्रबंधन करना था। दक्षिण-पूर्व एशिया में बसे भारतीय समुदाय के लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए आर्थिक सहयोग दिया था। 

अंडमान-निकोबार से भी जुड़ा था सरकार का इतिहास

आजाद हिंद सरकार के गठन के कुछ ही सप्ताह बाद अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह इसके इतिहास से जुड़ गया। 6 नवंबर 1943 को जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने टोक्यो में घोषणा की कि अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह आजाद हिंद की अस्थायी सरकार को हस्तांतरित किए जाएंगे। उस समय ये द्वीप जापानी सेना के कब्जे में थे। 

अंडमान में तिरंगा फहराने की तारीख भी है खास

आजाद हिंद सरकार के गठन के कुछ ही समय बाद नेताजी ने अंडमान-निकोबार का दौरा किया। 30 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर में उन्होंने तिरंगा फहराया था।
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आजाद हिंद सरकार और आजाद हिंद फौज में क्या अंतर था?

आजाद हिंद सरकार और आजाद हिंद फौज एक-दूसरे से जुड़ी थीं, लेकिन दोनों की भूमिका अलग थी। आजाद हिंद सरकार की स्थापना ने स्वतंत्रता आंदोलन को राजनीतिक आधार देने का प्रयास किया, जबकि आजाद हिंद फौज ने सैन्य अभियान में भूमिका निभाई।
  • आजाद हिंद सरकार: भारत की स्वतंत्रता की घोषणा और उसके लिए राजनीतिक तथा प्रशासनिक ढांचा प्रस्तुत करने वाली अस्थायी सरकार।
  • आजाद हिंद फौज (INA): ब्रिटिश शासन के खिलाफ सैन्य संघर्ष करने वाली सेना, जिसका नेतृत्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया।
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