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स्कूल बनवाने में खर्च कर दी पूरी बचत, मां के बेहतर इलाज के लिए भी पैसे नहीं, जानिए इनकी कहानी

Wed, 21 Nov 2018 04:30 PM IST
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
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 दादा जी मुझे बचपन में सबर जनजाति के लोगों के नारकीय जीवन के बारे में बताते थे। वह बताते थे कि किस तरह अनेक बुनियादी सहूलियतों के अभाव में वे लोग मजबूरन आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं। शायद यही वजह है कि ब्रिटिश काल के दौरान 1871 में आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत सबरों को भी शामिल किया गया था। वक्त बदला, कई चीजें बदलीं, पर इस समुदाय की दरिद्रता नहीं दूर हुई। वे आज भी अपनी उत्तरजीविता के लिए बेबस हैं।
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सबर अधिकतर पश्चिम बंगाल के मध्य इलाके में पाए जाते हैं। पुरुलिया, बांकुरा और पश्चिमी मिदनापुर जैसे जिले माओवादी हिंसा के लिए भी कुख्यात रहे हैं। मैं इनके बारे में जितना जानता गया, हालात बदलने का मेरा ख्याल उतना ही पुख्ता होता गया। मैं चाहता था कि कम से कम इस जनजाति की अगली पीढ़ी मुख्यधारा में शामिल हो। इसीलिए मैं इस समुदाय के बच्चों से घुल-मिलकर उन्हें पढ़ाने लगा। 1999 में मुझे कोलकाता पुलिस में नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने के बाद मेरे पास समय की तो कमी रहने लगी, पर मैं तनख्वाह से पैसे बचाकर उन बच्चों के लिए कुछ और भी करने के लिए सक्षम हो गया। चंद साल पहले गांव में मैंने अपने जैसे दूसरे लोगों की तलाश करना शुरू कर दिया।

कई कोशिशों के बाद एक ग्रामीण ने मुझे अपनी जमीन का एक हिस्सा स्कूल चलाने के लिए दान कर दिया। मेरे लिए यह बहुत बड़ी सफलता थी। आदिवासी बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए आठ साल पहले मैंने उस जमीन पर दो कमरों का स्कूल निर्माण कराया। उस वक्त मैंने किसी भी दूसरे शख्स से मदद नहीं ली, और पुलिस की नौकरी से की गई चार लाख रुपयों की पूरी की पूरी बचत स्कूल केलिए खर्च कर दी। जबकि कई लोगों ने मुझे सलाह दी थी कि स्कूल बनवाने के बजाय मुझे अपनी बीमार मां के बेहतर इलाज का प्रबंध करना चाहिए था। जब लोगों को पता चला कि एक पुलिस वाले ने अपनी पूरी बचत खर्च करके आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल बनावाया है, तो उनमें से कई लोग मेरी मदद के लिए सामने आए।
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लोगों का साथ मिला, तो जल्द ही दर्जन भर की संख्या से शुरू हुए स्कूल में सौ से ज्यादा बच्चे मुफ्त पढ़ने लगे। इस तरह एक प्यारी-सी जिद के कारण मैं पुलिस दादा से 'सबर बाबा' के नाम से जाना जाने लगा। मैं मानता हूं कि अब भी इस समुदाय के लिए शिक्षा से ज्यादा जरूरी है, अपना अस्तित्व बरकरार रखना। इसीलिए मैं सरकार और अन्य जिम्मेदार संस्थाओं से आग्रह करता हूं कि इनकी जीविका के लिए कुछ विशेष इंतजाम करें। दो साल पहले सौरव गांगुली के शो 'दादागिरी' में मुझे ‘24 घंटा अनन्य सम्मान’ दिया गया था। इसके लिए मुझे पैसे भी मिले थे, जिसे मैंने स्कूल में अतिरिक्त कमरे बनाने में खर्च किए। सोशल मीडिया या अन्य तरीकों से मेरे काम के बारे में जानकर कई लोग मेरी मदद के लिए सामने आए हैं। बावजूद इसके मैं बच्चों के लिए उतना नहीं कर पा रहा हूं, जितना कि मैं करना चाहता हूं। मेरे स्कूल में अभी चौथी कक्षा तक पढ़ाई होती है, जिसके बाद कई बच्चे पढ़ाई नहीं जारी रख पाते। मैं लगातार कोशिश में हूं कि अपने स्कूल में इतनी पढ़ाई संभव हो सके कि यहां से निकलने वाला हर आदिवासी छात्र एक बेहतर नागरिक बनकर समाज का हिस्सा बने। -विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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