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Survey: एआई से ऑनलाइन खतरों की चिंता बढ़ी, 56% अभिभावक-शिक्षक चाहते हैं इंटरनेट सेफ्टी बने स्कूल का मुख्य विषय

Tue, 10 Feb 2026 06:58 PM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

Survey: एक सर्वे में 56% से ज्यादा माता-पिता और शिक्षकों ने इंटरनेट सुरक्षा को स्कूल के मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग की है। एआई के बढ़ते असर के बीच साइबरबुलिंग, अनुचित कंटेंट और प्राइवेसी बड़ी चिंताएं हैं, जबकि ज्यादातर लोग खुद को पूरी तरह तैयार नहीं मानते।
 
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स्कूलों में पढ़ाई जाए इंटरनेट सुरक्षा- सर्वे - फोटो : Adobe Stock (अमर उजाला ग्राफिक्स)
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विस्तार
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Survey: एक नए सर्वे में सामने आया है कि 56 प्रतिशत से ज्यादा माता-पिता और शिक्षक चाहते हैं कि छात्रों को बढ़ते ऑनलाइन खतरों और गलत सामग्री से बचाने के लिए इंटरनेट सुरक्षा को स्कूल के मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। उनका मानना है कि आज के डिजिटल दौर में बच्चों को सुरक्षित तरीके से इंटरनेट इस्तेमाल करना सिखाना उतना ही जरूरी हो गया है जितना पारंपरिक पढ़ाई।

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सर्वे की खास बातें

सर्वे का मुख्य फोकस इस बात पर था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कैसे डिजिटल दुनिया को बदल रहा है और इसका बच्चों के सीखने, आपस में बातचीत करने और जानकारी समझने के तरीके पर गहरा असर पड़ रहा है।
  • इस अध्ययन में 1,800 माता-पिता और 300 शिक्षकों की राय शामिल की गई।
  • सर्वे का मुख्य फोकस इस बात पर था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डिजिटल दुनिया को कैसे बदल रहा है।

इंटरनेट सुरक्षा पढ़ाने को लेकर लोगों की राय

सर्वे के अनुसार, 32 प्रतिशत लोगों ने इंटरनेट सुरक्षा को एक अलग विषय के रूप में पढ़ाने की मांग की, जिसमें हर हफ्ते कक्षाएं हों। वहीं, 24 प्रतिशत प्रतिभागियों का कहना था कि इसे कंप्यूटर स्टडी जैसे पहले से मौजूद मुख्य विषयों के साथ जोड़ा जाना चाहिए ताकि बच्चे नियमित रूप से इस बारे में सीख सकें।
 
सुझाव प्रतिशत
इंटरनेट सुरक्षा को अलग विषय बनाकर साप्ताहिक कक्षाएं हों 32%
कंप्यूटर स्टडी जैसे मौजूदा विषयों में शामिल करके पढ़ाया जाए 24%

ऑनलाइन सुरक्षा अब विकल्प नहीं बल्कि जरूरी कौशल: सर्वेक्षण कर्ता

इस सर्वे को कराने वाले सिल्वरलाइन प्रेस्टिज स्कूल के वाइस चेयरमैन नमन जैन ने कहा कि इसके नतीजे एक चेतावनी की तरह हैं। उन्होंने बताया कि माता-पिता और शिक्षक साफ-साफ कह रहे हैं कि आज के छात्रों की डिजिटल दुनिया उस समय से पूरी तरह अलग है जब वे खुद बड़े हो रहे थे। एआई इंटरनेट के हर हिस्से को बदल रहा है, इसलिए ऑनलाइन सुरक्षा अब विकल्प नहीं बल्कि जरूरी कौशल बन चुकी है।

उन्होंने आगे कहा कि स्कूलों की जिम्मेदारी सिर्फ किताबों का ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को जागरूक बनाना और उन्हें ऐसे उपकरण देना भी जरूरी है जिससे वे डिजिटल दुनिया में सुरक्षित और समझदारी से आगे बढ़ सकें। शिक्षकों को ऐसा पाठ्यक्रम तैयार करना चाहिए जो बच्चों को भविष्य के अवसरों के साथ-साथ संभावित खतरों के लिए भी तैयार करे।

सबसे बड़ी ऑनलाइन चिंताएं क्या हैं?


 
  • सर्वे में 34 प्रतिशत प्रतिभागियों ने साइबरबुलिंग को रोकने और उसकी शिकायत करने की व्यवस्था को सबसे बड़ी चिंता बताया।
  • 29 प्रतिशत लोगों ने अनुचित सामग्री और ऑनलाइन शिकारियों से बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
  • 22 प्रतिशत प्रतिभागियों ने निजी जानकारी की सुरक्षा और जिम्मेदारी से साझा करने की जरूरत पर जोर दिया।
  • 15 प्रतिशत लोगों ने स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने और डिजिटल लत से बचाने को महत्वपूर्ण बताया।

डिजिटल सुरक्षा कक्षाएं कितनी बार होनी चाहिए?


 
जब डिजिटल सुरक्षा से जुड़े पाठ्यक्रम की अवधि और नियमितता के बारे में पूछा गया, तो 42 प्रतिशत लोगों ने हर महीने सत्र आयोजित करने की बात कही। 35 प्रतिशत प्रतिभागियों ने हर टर्म में कार्यक्रम चलाने का समर्थन किया, 16 प्रतिशत ने साल में दो बार सत्र कराने की बात कही, जबकि सिर्फ 7 प्रतिशत लोगों का मानना था कि साल में एक बार की कक्षा पर्याप्त होगी।
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उभरते ऑनलाइन खतरों को लेकर चिंता का स्तर

उभरते ऑनलाइन खतरों को लेकर चिंता के स्तर पर पूछे गए सवाल में 40 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे छात्रों के अनुचित सामग्री के संपर्क में आने और ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को लेकर 'बहुत ज्यादा चिंतित' हैं और इसे रोज की चिंता बताते हुए तुरंत कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया। वहीं 24 प्रतिशत लोगों ने खुद को 'मध्यम रूप से चिंतित' बताया।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि सिर्फ 12 प्रतिशत प्रतिभागियों को लगता है कि वे ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को सक्रिय रूप से संभालने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। अधिकांश यानी 51 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे कुछ हद तक तैयार हैं, लेकिन उन्हें ज्यादा संसाधनों और प्रशिक्षण की जरूरत है। वहीं 29 प्रतिशत प्रतिभागियों ने माना कि वे बहुत कम तैयार महसूस करते हैं और तेजी से बदलती तकनीक के साथ कदम मिलाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है।
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