अदालत ने एक व्यक्ति को दुष्कर्म के आरोप से इस आधार पर बरी कर दिया कि शिकायतकर्ता उसकी कानूनी पत्नी थी। अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता है, क्योंकि आरोपी और पीड़िता कानूनी रूप से विवाहित थे। अदालत ने कहा कि सात फेरे पूरे होने पर कानूनी रूप से वैध विवाह अस्तित्व में आता है।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1956 की धारा 7, जो हिंदू विवाह के समारोहों की व्याख्या करती है, कहती है कि दूल्हा और दुल्हन एक साथ पवित्र अग्नि के सामने सातवां कदम उठाने के बाद विवाह पूर्ण और बाध्यकारी हो जाता है। रोहिणी अदालत स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जगमोहन सिंह आरोपी के खिलाफ एक मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 493, 420 और 380 के तहत आरोप लगाए गए हैं।
अदालत ने पीड़िता के बयान पर गौर किया कि उसकी शादी 21 जुलाई 2014 को एक पुजारी की उपस्थिति में अग्नि के सात फेरे लेने के बाद एक मंदिर में आरोपी के साथ संपन्न हुई थी। पीड़िता ने शिकायत की थी कि विवाह प्रमाण पत्र प्रदान नहीं किया गया। इस पर अदालत ने कहा कि वह गलत धारणा ले रही थी कि जब तक मंदिर अधिकारियों द्वारा प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जाता तब तक विवाह अमान्य था।
अदालत ने कहा वर्तमान मामले में, चूंकि सप्तपदी समारोह पूरा हो चुका था, इसलिए मंदिर अधिकारियों द्वारा तथाकथित विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी न करने का कोई कानूनी परिणाम नहीं है। साउथ रोहिणी पुलिस स्टेशन ने 2015 में आरोपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। जुलाई 2016 में उसके खिलाफ आरोप तय किए गए थे।