राष्ट्रीय राजधानी के कुछ क्षेत्रों में जनगणना सर्वेक्षण के नाम पर फर्जी फॉर्म का इस्तेमाल कर लोगों से संवेदनशील जानकारी जुटाने की कोशिश का मामला सामने आया है। वरिष्ठ जनगणना अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि आगामी जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी और इसमें किसी प्रकार के कागजी फॉर्म का उपयोग नहीं किया जा रहा है। हालांकि उत्तर-पूर्व जिले के पुलिस उपायुक्त संदीप लांबा ने इस तरह का मामला सामने आने की बात से इंकार किया है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार उत्तर-पूर्वी और पूर्वी दिल्ली के कुछ इलाकों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां घरों में छपे हुए फॉर्म दिए जा रहे हैं, जिनमें आवास की स्थिति, परिवार के सदस्यों, संपत्ति, पेयजल, शौचालय, ईंधन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जुड़ी जानकारी मांगी जा रही है। एक वरिष्ठ जनगणना अधिकारी ने इन फॉर्मों को फर्जी बताते हुए लोगों को किसी भी अज्ञात व्यक्ति के साथ व्यक्तिगत जानकारी साझा न करने की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि इस बार जनगणना प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल है और डेटा संग्रह के लिए किसी भी प्रकार के कागजी फॉर्म का उपयोग नहीं किया जा रहा है। लोगों को ऐसे फॉर्म लेकर आने वाले किसी भी व्यक्ति को संवेदनशील जानकारी नहीं देनी चाहिए।
प्रशासन ने कहा, बिना जांचें किसी को कुछ न बताएं :
एक अन्य अधिकारी ने बताया कि इस प्रक्रिया में मोबाइल का उपयोग मुख्य रूप से गणनाकर्ता और पर्यवेक्षकों द्वारा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आशंका है कि कुछ लोग जनगणना के नाम पर धोखाधड़ी कर व्यक्तिगत और घरेलू जानकारी एकत्र करने की कोशिश कर रहे हैं। जिन फॉर्मों का वितरण कुछ इलाकों में किया जा रहा है, उनमें मोबाइल फोन, इंटरनेट सुविधा, वाहन और आवासीय सुविधाओं सहित विस्तृत सामाजिक-आर्थिक जानकारी मांगी जा रही है। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे जनगणना से जुड़े किसी भी व्यक्ति की पहचान अवश्य सत्यापित करें और केवल सरकारी सूचना पर ही भरोसा करें। अधिकारियों ने बताया कि जनगणना कर्मी और पर्यवेक्षक क्यूआर कोड वाले पहचान पत्र लेकर चल रहे हैं, जिन्हें स्कैन कर उनकी पहचान की पुष्टि की जा सकती है।
16 मई से शुरू हुआ था सरकारी सर्वे :
मकान-सूचीकरण कार्य दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के 250 वार्डों में चल रहा है, जिसमें अब तक लगभग 25,000 ब्लॉकों को कवर किया जा चुका है। इस कार्य में 50,000 से अधिक गणनाकर्ता तैनात हैं। अधिकारियों ने कहा कि जनगणना रिकॉर्ड पूरी तरह गोपनीय होते हैं और जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 15 के तहत संरक्षित हैं। ये रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध नहीं होते और केवल कानून में निर्धारित परिस्थितियों में ही उपयोग किए जा सकते हैं।