राजधानी का ऐतिहासिक पालम गांव कभी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध था, मगर आज मूलभूत सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। शहरीकृत गांव का दर्जा मिलने के बावजूद पालम गांव तक विकास की चमक नहीं पहुंची है। नतीजा यह है कि गांव के निवासी दिन-प्रतिदिन बढ़ती समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जिनमें गंदे पानी की आपूर्ति, टूटी सड़कें, सीवर ओवरफ्लो, यातायात जाम, पार्कों की दुर्दशा आदि प्रमुख समस्याएं हैं।
पालम गांव के निवासियों ने अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में बारी-बारी से समस्याओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गांव शहरीकृत घोषित करने के समय वह काफी खुश हुए थे। उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें भी शहर जैसी सुविधाएं मिलेगी, लेकिन विकास कार्यों की कमी और प्रशासनिक लापरवाही ने उनके जीवन को कठिन बना दिया है। वे करीब-करीब तमाम मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।
गांव में एक भी शहरी जैसी सुविधा उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, गांवों में सुविधा बढ़ने के बजाए कम हो गई है। सरकार और अधिकारियों को गांव की समस्याओं पर ध्यान देकर त्वरित और प्रभावी समाधान प्रदान करना चाहिए, ताकि पालम अपने गौरवशाली इतिहास के साथ एक बेहतर वर्तमान और भविष्य की तस्वीर पेश कर सके।
लोगों ने बताई समस्याएं
गांव में गंदे और अशुद्ध पानी की आपूर्ति एक बड़ी समस्या बन चुकी है। कई घरों में पाइपलाइन से आने वाला पानी पीने लायक नहीं है, जिससे लोग जलजनित बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। सीवर ओवरफ्लो की समस्या भी बनी हुई है।
- चौ. सुरेंद्र सोलंकी
गांव की सड़कें बदहाल हैं और लंबे समय से निर्माण और मरम्मत की राह देख रही हैं। कई जगहों पर सड़कें इतनी खराब हो चुकी हैं कि बरसात के मौसम में जलभराव से आवागमन मुश्किल हो जाता है। बिजली के खंभे और स्ट्रीट लाइटें भी खराब पड़ी हैं, जिससे रात के समय असुरक्षा का माहौल बनता है।
- चौ. रणवीर सोलंकी
गांव के लोग प्रशासन की इस उपेक्षा से बेहद नाराज हैं। उनका कहना है कि चुनाव के समय नेता विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन जीतने के बाद पलटकर देखने तक नहीं आते। स्थानीय निवासियों ने कई बार पानी, सीवर और सड़क से जुड़ी समस्याओं को लेकर शिकायतें की हैं, मगर अभी तक ठोस कदम नहीं उठाए गए।
- ओमप्रकाश सोलंकी
वर्षों पहले गांव में बना बस टर्मिनल शिफ्ट कर दिया गया और गांव की मुख्य सड़क से बसों का परिचालन बंद कर दिया। इस कारण गांव के निवासियों को बस सेवा के लिए एक से दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। या फिर उन्हें महंगे प्राइवेट वाहनों का सहारा लेना पड़ता है। पहले गांव से दिल्ली के तमाम इलाकों में जाने वाली बसें उपलब्ध थी।
- सतवीर सोलंकी