- एम्स के अध्ययन में खुलासा, प्रदूषण से बच्चे का विकास और जन्म वजन हो सकता है प्रभावित
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। वायु प्रदूषण का असर अब केवल फेफड़ों और श्वसन तंत्र तक सीमित नहीं रह गया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषण कण गर्भवती महिलाओं की गर्भनाल तक पहुंचकर गर्भ में पल रहे शिशु के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। अध्ययन के अनुसार, पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे कण गर्भनाल की कोशिकाओं में प्रवेश कर सूजन पैदा करते हैं। इससे गर्भस्थ शिशु तक पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषण नहीं पहुंच पाता, जिससे उसका शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रदूषण के असर से जन्म लेने वाले बच्चों का वजन सामान्य से 34 प्रतिशत तक कम पाया गया। उनमें मोटर स्किल्स कमजोर थीं और व्यवहार में भी बदलाव देखा गया। एम्स के जैव रसायन रोजगार के प्रो. सुभ्रदीप कर्मकार ने बताया कि दिल्ली और झारखंड देवघर के अस्पतालों के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में पीएम 2.5 का स्तर अधिक था, वहां कम वजन वाले बच्चों के जन्म के मामले दोगुने से अधिक थे। गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप की गंभीर समस्या प्री-एक्लेम्प्सिया के मामले भी तीन गुना ज्यादा पाए गए। उन्होंने चेतावनी दी है कि साफ हवा गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य गंभीर खतरे में पड़ सकता है।