स्पोर्ट्स सिटी परियोजना में आठ हजार करोड़ की गड़बड़ी की जांच एसआईटी को सौंपी जा सकती है। इस मामले में सीएजी ने 24 बिंदुओं पर आपत्तियां लगाई है, जिस पर लोकलेखा समिति (पीएसी) की सुनवाई भी चल रही है। पीएसी की सुनवाई के बाद संभव है कि मामले की जांच एसआईटी को सौंप दी जाए।
इस मामले में पीएसी की ओर से शासन की एक उच्च स्तरीय कमेटी के गठन का भी प्रस्ताव था। लेकिन यह कमेटी गठित नहीं हुई और न ही किसी तरह की जांच हो पाई। अगर जांच का काम तरीके से हुआ तो इस मामले में प्राधिकरण के कई अधिकारी फंसते नजर आएंगे। सूत्रों की मानें तो इस परियोजना में मानकों को ताक पर रखकर काम किया गया। यही नहीं नियमों से इतर कई फैसले लिए गए।
इस वजह से प्राधिकरण को करीब 8000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। सीएजी के ऑडिट में इस तरह की आशंका व्यक्त की गई है। अब जबकि प्राथमिक जांच में किसी तरह का समाधान नहीं निकल रहा है। वहीं, प्राधिकरण के दूसरे मामलों में एसआईटी के आने के बाद समाधान के संकेत दिख रहे हैं। लिहाजा इस मामले की जांच भी एसआईटी को सौंपने के संकेत मिल रहे हैं।
दोषियों की पहचान का काम अब भी बाकी
सूत्रों के मुताबिक स्पोर्ट्स सिटी परियोजना के कुछ हिस्से का नक्शा गलत पास किया गया है। इस वजह से परियोजना की मूल भावना आहत हुई। जब अलग-अलग बिल्डरों को टुकड़ों में जमीन दी गई तो उन्होंने इमारत बनाने के लिए नक्शा पास कराया। यहां भी उन्होंने खेल सुविधाओं का ध्यान नहीं रखा। ऐसे में परियोजना का काम नियम के तहत नहीं हो पाया। इसके अलावा कहीं-कहीं खेल सुविधाओं के लिए 70 प्रतिशत आरक्षित जमीन के बदले 63 और 65 प्रतिशत ही जमीन बची हुई है।
ऐसे में यह नियमों का साफ उल्लंघन है। कमेटी को इन सभी मामलों में जांच कर दोषियों को सामने लाना था। लेकिन दोषी अभी भी पकड़ से बाहर हैं। पूरी परियोजना में जमीन के आवंटन शुल्क पर भी सवाल खड़े हुए हैं कि इस परियोजना को स्पेशल बताकर कम रेट पर बिल्डरों को जमीन दी गई। सबसे बड़ा आरोप यह है कि जिन मुख्य बिल्डरों को जमीन दी गई, उन्होंने इस प्लॉट के टुकड़े करते हुए कई बिल्डरों को बेच दिया। यहां से यह परियोजना नाकामी का शिकार हो गई। किसी भी बिल्डर ने खेल सुविधाओं का विकास नहीं किया। सेक्टर 78, 79, 150, 151 और 152 में स्पोर्ट्स सिटी हैं।
यूपी कैबिनेट के फैसले का नहीं मिलेगा लाभ
स्पोर्ट्स सिटी परियोजना के 15 हजार फ्लैट खरीदार अब भी बुरी तरह से फंसे हुए हैं। रजिस्ट्री तो दूर की बात इसके समाधान के लिए चल रही कवायद अब तक खत्म नहीं हुई है। खास बात यह कि कैबिनेट की ओर से बिल्डर-खरीदार मामले में दी गई छूट का लाभ स्पोर्ट्स सिटी के बिल्डरों व खरीदारों को नहीं दिया गया है। इस वजह से खरीदार बेहद निराश हैं।
यह है मामला
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की सितंबर 2021 में नोएडा प्राधिकरण के परफॉर्मेंस ऑडिट की रिपोर्ट के आधार पर लगाई गई आपत्तियों की सुनवाई के दौरान पीएसी ने पहले चरण में स्पोर्ट्स सिटी का मुद्दा उठाया है। इसके तहत आपत्तियों पर सुनवाई हो रही है। इसमें प्रमुख आरोप यह है कि इस परियोजना का काम पूरा नहीं हुआ और यहां 70 प्रतिशत भाग पर खेल सुविधाओं का विकास नहीं हुआ। आलम यह है कि बाकी बचे हुए 30 प्रतिशत भाग पर बिल्डरों ने इमारत खड़ी कर दी। जो कि बाद में करनी थी। यही नहीं आरोप यह भी है कि खेल सुविधाओं के लिए आरक्षित जमीन को भी घेरा गया और मानक की धज्जियां उड़ाई गईं।