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नोएडा: दिल्ली पहुंची सोनम वांगचुक की लड़ाई

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लद्दाख के इको सिस्टम को बचाने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने के लिए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन

अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
लद्दाख के इको सिस्टम को बचाने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने के लिए पर्यावरणविद सोनम वांगचुक की लड़ाई अब दिल्ली पहुंच गई है। सोनम वांगचुक की अगुवाई में बुधवार को लद्दाख के कई संगठनों और वहां के स्थानीय लोगों ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया। वांगचुक ने कहा कि वह भाजपा के आभारी हैं कि उसने लद्दाख को यूटी का दर्जा दिया, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने 2019 में लद्दाख के लोगों से संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने का वादा किया था, वह अभी तक पूरा नहीं किया। सरकार ने लद्दाख को कोट तो दिया, लेकिन बटन अब तक नहीं मिली है।

सोनम वांगचुक के साथ लेह-कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस फ्रंट के तमाम नेता, दिल्ली में पढ़ाई करने वाले लद्दाख के छात्र यहां मौजूद थे। लद्दाख के पूर्व सांसद थुपस्तान छेवांग, कांग्रेस नेता असगर अली करबलाई, दिल्ली में लद्दाख के छात्रों की राजनीति करने वाले सज्जाद कारगिली जैसे दर्जन भर नेता मंच पर थे।
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लद्दाख के पर्यावरण को बचाने के लिए इससे पहले वांगचुक ने 1500 फीट की ऊंचाई पर माइनस पच्चीस डिग्री में पांच दिनों का अपना क्लाइमेट फास्ट किया था। जंतर मंतर से सोनम वांगचुक ने कहा कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में लद्दाख को संविधान की छठीं अनुसूची में शामिल करने का वादा किया था। लेकिन चुनाव के बाद यह विषय बातचीत की टेबल से गायब है।

सोनम वांगचुक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से अपील करते हुए कहा कि लद्दाख पर्यावरण के लिहाज से अति संवेदनशील है। यदि हमारे पर्वतों के ग्लेशियर पिघले तो इसका परिणाम केवल लद्दाख को नहीं समूचे उत्तर भारत को भी भुगतना पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन और मशीनी गतिविधियों से ग्लेशियर को बचाना हम सबका कर्तव्य है। लद्दाख के लोगों और पहाड़ों की संस्कृति को बचाने की जिम्मेदारी हम सब की है।
लद्दाख के लोग अपना मुस्तकबिल खुद तय करेंगे
सोनम वांगचुक ने कहा कि तीन साल पहले सरकार ने लद्दाख को बिना विधानसभा के यूटी का दर्जा दिया। जब 2.5 लाख की आबादी वाले सिक्किम को विधानसभा वाले राज्य का दर्जा मिल सकता है तो तीन लाख की आबादी वाले लद्दाख को भी यह हक मिलना चाहिए। लद्दाख का केंद्रीकरण कर दिया गया। लेकिन लद्दाख के शहरी अपना मुस्तकबिल खुद तय करना चाहते हैं। एलजी को लद्दाख को समझने में समय लगता है। 2-3 साल में जबतक एलजी पहाड़ों को समझते हैं, तब तक उनके जाने का समय हो जाता है। लद्दाख के लोगों को सोने की कटोरी में बिजनेस और प्रदूषण नहीं चाहिए। उन्हें खुला आसमान और बहता साफ पानी चाहिए।
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70 साल बाद आधा मिला - थुपस्तान छेवांग
थुपस्तान छेवांग ने कहा कि लद्दाख के लोग करीब 70 साल से यूटी विद लेजिस्लेटिव एसेंबली की मांग कर रहे हैं। लेकिन गृहमंत्री ने 2019 में यूटी तो दिया लेकिन लेजिस्लेटिव एसेंबली की जगह गवर्नर शासन दे दिया। लद्दाख में गवर्नर, डायरेक्टर सब बाहर के हैं। तीन साल से लद्दाख में यूटी एडमिनिस्ट्रेशन ने एक भी भर्ती नहीं निकाली। केवल पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बलों में भर्तियां हुई हैं। हमें ऐसी शासन व्यवस्था नहीं चाहिए।
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