मूलधन चुकाया नहीं, ब्याज पर छूट की मांग कर रहे बिल्डर
नोएडा प्राधिकरण ने शासन को भेजी रिपोर्ट, शासन करेगा बिल्डरों के मामले पर फैसला
बिल्डरों ने शासन की ब्याज पर छूट की मांग, प्राधिकरण का है 8500 करोड़ का बकाया
सुशील पांडेय
नोएडा। नोएडा के बिल्डरों ने प्राधिकरण से आवंटित जमीन का मूलधन तक नहीं चुकाया और ब्याज पर छूट की मांग कर रहे हैं। ऐसे में नोएडा के एक-एक बिल्डरों की रिपोर्ट बनाकर प्राधिकरण ने शासन को भेज दिया है। अब शासन इस पर फैसला किया जाएगा। बिल्डरों पर प्राधिकरण का 8,500 करोड़ रुपये का बकाया है।
सुप्रीम कोर्ट से ब्याज के मामले में हारने के बाद नोएडा के बिल्डरों ने शासन से गुहार लगाई है। उनका कहना है कि करीब-करीब सारा पैसा जमा करा दिया गया है, बावजूद इसके प्राधिकरण ने दंडात्मक ब्याज लगाकर बकाये की राशि उन पर लाद दी। अब जब तक यह बकाया नहीं चुकाया जाता है तब तक प्राधिकरण की ओर से ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) नहीं दी जा रही है। ऐसे में फ्लैट खरीदारों की रजिस्ट्री फंसी हुई है। उन्होंने शासन से ब्याज में छूट दिलाने की मांग की है। इस मामले में शासन की ओर से प्राधिकरण से रिपोर्ट मांगी गई। प्राधिकरण ने एक-एक बिल्डरों के मूलधन और ब्याज के बकाये की गणना की। गणना के बाद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। इसमें अब तक मूलधन का बकाया होने की जानकारी मिली।
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29 अधूरे प्रोजेक्ट में 45 प्रतिशत मूलधन की राशि बकाया
प्राधिकरण के सूत्रों के मुताबिक, 29 अधूरे प्रोजेक्टों में बिल्डरों पर करीब 7,000 करोड़ का बकाया है। यह बकाया मूलधन और ब्याज को मिलाकर है। खास बात यह कि इस बकाये की गणना में यह पता चला कि अब भी मूलधन की 45 प्रतिशत राशि बिल्डरों पर बकाया है, यानी उन्होंने पूरा मूलधन तक नहीं चुकाया है। मूलधन नहीं चुकाने की वजह से इस पर वार्षिक ब्याज लग रहा है और यह बढ़ता जा रहा है।
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पूरे हो चुके 24 प्रोजेक्ट में 20 प्रतिशत मूलधन बकाया
आलम यह है कि नोएडा के 24 प्रोजेक्ट कब के पूरे हो चुके हैं, लेकिन यहां भी बिल्डरों ने कुल मूलधन की 20 प्रतिशत राशि नहीं चुकाई है। बकाये पर ब्याज लगकर आंकड़ा 1500 करोड़ तक पहुंच चुका है। इन प्रोजेक्टों में बिल्डरों के बकाया नहीं चुकाने की वजह से रजिस्ट्री फंसी हुई है। कई परियोजनाओं में बिल्डरों ने खरीदारों को फ्लैट पर कब्जा भी दे दिया है, लेकिन अपने पैसे बचाने के लिए प्राधिकरण का बकाया नहीं दे रहे हैं। ऐसे में रजिस्ट्री का काम नहीं हो पा रहा है।
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10 साल का बना था पेमेंट प्लान
प्राधिकरण ने 2010 में जितने भी बिल्डरों को जमीन का आवंटन किया। उनसे पहले चरण में आवंटित जमीन की कुल राशि का 10 प्रतिशत लेकर जमीन दे दिया। जमीन देने के बाद उनके लिए 10 साल का पेमेंट प्लान बनाया, यानी इन 10 वर्षों में ब्याज सहित पूरा बकाया चुका देना था। लेकिन अधिकांश बिल्डरों ने बकाये की किस्त जमा नहीं की। इस वजह से वह डिफॉल्टर घोषित हो गए। प्राधिकरण ने दो बार डिफॉल्टर बिल्डरों की सूची जारी की। पहली बार सूची जारी करने के बाद बिल्डरों के साथ-साथ खरीदारों को भी इन प्रोजेक्टों में लोन लेने में दिक्कतें आईं।
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एस्क्रो अकाउंट से नजर रखेगा प्राधिकरण
अब प्राधिकरण बिल्डरों के साथ एस्क्रो अकाउंट खुलवाने का काम कर रहा है। इसका मकसद खरीदारों की ओर से आए पैसे पर निगरानी रखना है। अधिकांश मामलों में फंड डायवर्ट कर दिया गया। ऐसे में फ्लैट पूरे बने नहीं और खरीदार ठोकरें खा रहे हैं। एस्क्रो अकाउंट के माध्यम से पैसे का सही जगह उपयोग हो सकेगा।
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केवल 350 करोड़ रुपये आए वापस
प्राधिकरण के खूब दबाव बनाने के बाद भी केवल 350 करोड़ रुपये वापस आ पाए। बिल्डरों ने प्राधिकरण के रिशिड्यूलमेंट पॉलिसी और सिंगल फ्लैट रजिस्ट्री के प्लान में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। गिनती के बिल्डरों ने इस प्लान को अपनाया। इस वजह से प्राधिकरण का बकाया अब तक फंसा हुआ है।