बॉक्सिंग में आप कितनी बार गिरते हो यह महत्वपूर्ण नहीं है। आप नॉक आउट नहीं होते और जल्दी उठकर खड़े हो जाते हो यह बड़ी बात है। हर खेल में यही लागू होता है। पराजित होना कोई महत्व नहीं रखता, बल्कि दोबारा पूरी इच्छाशक्ति से मैदान में आ जाना महत्वपूर्ण है। रविवार को अमर उजाला के नोएडा परिसर में आयोजित जूनियर शतरंज प्रतियोगिता में विजयी खिलाड़ियों को पुरस्कृत करते हुए ग्रैंड मास्टर प्रवीण थिप्से ने सभागार में कुछ इस तरह के टिप्स दिए।
प्रवीण थिप्से ने प्रतियोगिता के आयोजन के लिए अमर उजाला को बधाई और धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि ग्रास रूट लेवल पर एक या दो प्रतिशत लोग ही शतरंज के खेल को पसंद करते हैं। अमर उजाला की ओर से इस स्तर पर पूरे प्रदेश में इतनी बड़ी प्रतियाेगिता का आयोजन करना बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि यदि संस्थान लगातार दस वर्ष तक इस तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित करता रहे तो आने वाले समय में यूपी से चैंपियन जरूर निकलेगा। उन्होंने बताया कि 1965 में यूपी ने कानपुर से पहला नेशनल चैंपियन दिया था। इस मुहिम से यूपी विश्व चैंपियन देगा।
प्रवीण ने बताय कि जब उन्होंने खेलना शुरू किया था तो इतनी सहूलियतें नहीं थीं। एक जगह से दूसरे स्थान पर जाना कठिन था। उन्होंने खिलाड़ियों और उनके माता-पिता से कहा कि खेल में कुछ घंटों का नहीं बल्कि हजारों घंटों की मेहनत का फल मिलता है। ऐसे में खिलाड़ियों और उनके अभिभावकों को धैर्य से लगे रहना होगा। खिलाड़ियों की प्रतिभा को कम किए बगैर उनकी कमियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि छोटी उम्र में ही बच्चों को शतरंज खेलना शुरू कर देना चाहिए। नहीं तो 20 वर्ष का हो जाने के बाद उसे प्रोफेशनल स्तर पर खिलाड़ी बनने में दिक्कत आएगी। उन्होंने विश्वनाथन आनंद को कोट करते हुए कहा कि 15 वर्ष में यदि कोई ग्रैंड मास्टर नहीं बना तो उसका प्रोफशनल कॅरिअर अधिक नहीं चल सकता। उन्होंने कहा कि शतरंज सभी को खेलना चाहिए, इस खेल से बौद्धिक क्षमता का विकास होता है। शतरंज खेलने के बाद भी किसी दूसरे खेल में जा सकते हैं।