ग्रेटर नोएडा (संवाद)। अंसल गोल्फ लिंक-1 सेक्टर में रविवार को राष्ट्रचिंतना संस्था ने मासिक गोष्ठी में भारतीय इतिहास पर चर्चा की। देश की आजादी से पहले चले दो बडे आंदोलनों का इतिहास में जिक्र नहीं होने पर वक्ताओं ने विचार रखे। इतिहासकार एवं चिंतना संस्था के संस्थापक कृष्णानंद सागर ने कहा कि 1947 से पहले घटित भारतीय इतिहास के दो महत्त्व पूर्ण आंदोलनों को इतिहास में लिखा ही नहीं गया। पहला आंदोलन 1905 में बंग-भंग आंदोलन शुरू हुआ था जिसमें बंगाल के विभाजन का विरोध कलकत्ता से शुरू होकर पूरे देश में फैल गया और 1911 में अंग्रेजों को बंगाल को एक करना पड़ा। दूसरा आंदोलन आर्य समाज एवं अन्य हिन्दू संगठनों के द्वारा 1930 और 1940 के दशक में हैदराबाद में हुआ। जहां हिन्दू बहुसंख्यक होते हुए भी निजाम ने हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगा दिया था। हैदराबाद में पुलिस बर्बरता, सत्याग्रह और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष के कई चरण शामिल थे। इस अवसर पर राजेंद्र सोनी, किसलय कुमार, डॉ दिनेश शर्मा, संगीता वर्मा, योगेश शर्मा, अरविंद साहू, धरम पाल भाटिया, अवधेश गुप्ता, डॉ गौरव, नवनीता, महेश, प्रेरणा, रजनी भाटिया, वी के श्रीवास्तव, अक्षत मौजूद रहे।