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गुरुमंत्र : कंकड़ और बीजों का इस्तेमाल गणित सिखाने के लिए किया

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तरुण चौहान, सहायक अध्यापक, कंपोजिट विद्यालय तीरथली
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सरकारी विद्यालयों में संसाधनों की कमी के बावजूद शिक्षक स्थानीय और आसानी से उपलब्ध वस्तुओं का प्रयोग कर बच्चों को रोचक तरीके से पढ़ा सकते हैं। कंपोजिट विद्यालय तीरथली में शिक्षक इसी तरह के प्रयोगों के माध्यम से विद्यार्थियों को वर्णमाला, गणित और रचनात्मक गतिविधियां सिखा रहे हैं। ग्रामीण परिवेश के कई बच्चे महंगी स्लेट, नोटबुक और अन्य आधुनिक शिक्षण संसाधन नहीं खरीद पाते हैं। ऐसे में घर में आसानी से उपलब्ध होने वाली वस्तुओं को शिक्षण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। दाल के दानों की मदद से बच्चों को वर्णमाला और अक्षर ज्ञान कराया जाता है। इससे बच्चे खेल-खेल में अक्षरों को पहचानना और लिखना सीखते हैं। इसी तरह कंकड़ और बीजों का इस्तेमाल गणित सिखाने के लिए किया जाता है। इनके माध्यम से बच्चों को गिनती, जोड़-घटाव और संख्या की समझ विकसित करने में मदद मिलती है। वहीं ड्राइंग में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों को गीली मिट्टी के माध्यम से पेंटिंग और आकृतियां बनाना सिखाया जाता है। स्थानीय वस्तुओं से तैयार शिक्षण सामग्री बच्चों की रुचि बढ़ाने के साथ सीखने की प्रक्रिया को भी आसान बनाती है। ग्रामीण परिवेश के बच्चे इन गतिविधियों में उत्साह से हिस्सा लेते हैं और तेजी से सीखते हैं। इन प्रयोगों का असर विद्यालय के शैक्षिक परिणामों में भी देखने को मिल रहा है। संसाधनों की कमी बच्चों की सीखने की क्षमता में बाधा नहीं बननी चाहिए। स्थानीय वस्तुओं के रचनात्मक इस्तेमाल से पढ़ाई को रोचक और प्रभावी बनाया जा सकता है। -तरुण चौहान, सहायक अध्यापक, कंपोजिट विद्यालय तीरथली
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