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Noida News: 40 हजार डीजी सेट पर मंडरा रहा सीलिंग का संकट

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40 हजार डीजल जनरेटर सेट पर मंडरा रहा सीलिंग का संकट
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- सात दिन बाद कसेगा शिकंजा, जांच के लिए 50 टीमें हुई सक्रिय

- 90 प्रतिशत औद्योगिक इकाइयों ने अब तक नहीं अपनाया दोहरे ईंधन का विकल्प
माई सिटी रिपोर्टर

नोएडा। जिले में डीजल से संचालित होने वाले 40 हजार से ज्यादा डीजल जनरेटर (डीजी) सेट पर सीलिंग का संकट मंडरा रहा है। यह वो डीजी सेट हैं जिन्हें दोहरे ईंधन (डीजल के साथ सीएनजी गैस) में बदलने के लिए 15 मई तक की समय सीमा दी गई है। केवल सात दिन शेष बचे हैं, लेकिन अभी भी 90 फीसदी औद्योगिक इकाइयों के अलावा व्यापारिक प्रतिष्ठानों और ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी में डीजल जनरेटर ने दोहरे इंजन का विकल्प नहीं अपनाया है।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के आदेश सख्ती से लागू करने के लिए जिले में 50 से अधिक जांच टीमें सक्रिय हो गई हैं। इन टीमों ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जायजा लेना शुरू कर दिया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने बताया कि तय समय सीमा के बाद जांच टीमें डीजल जनरेटरों को सील करना शुरू कर देंगी। जिले में उद्योगों की संख्या लगभग 25 हजार है, लेकिन अब तक महज 10 फीसदी इकाइयों ने ही दोहरे ईंधन का विकल्प अपनाया है। बिजली कटौती के बीच रोजाना तीन से चार घंटे तक जनरेटर चलाए जा रहे हैं।
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इस फैसले से शहर की बहुमंजिला आवासीय इमारतों में रहने वालों की परेशानी सबसे ज्यादा बढ़ेगी, क्योंकि महज 12 ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी ने ही अब तक दोहरे ईंधन वाले जनरेटर सेट का बंदोबस्त किया है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में एक हजार से अधिक ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी हैं। सेक्टर-18 और अट्टा सहित बड़े बाजारों के व्यापारिक प्रतिष्ठान अब भी अभी डीजल जनरेटर पर आश्रित हैं।



बैठकों का दौर शुरू

15 मई के बाद डीजल जनरेटर पर पाबंदी के लिए एक्शन प्लान बना लिया गया है। लगातार बैठकों का दौर जारी है। सीएक्यूएम की निगरानी में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अलावा अन्य विभागों के अधिकारी-कर्मचारियों की अलग-अलग टीमें औचक निरीक्षण करेंगी। विद्युत सुरक्षा की ओर से प्रमाणित जनरेटर को ही सीलिंग के दायरे से बाहर रखा जाएगा।
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कोट

15 मई के बाद डीजी सेट नहीं चलने दिए जाएंगे। जिले में सीएक्यूएम के आदेश को प्रभावी तरीके से लागू कराया जाएगा। हमारी तरफ से लगातार इस समय सीमा से अवगत कराया जा रहा है। इसके बाद भी उद्यमी, व्यापारी, आरडब्ल्यूए और एओए दोहरे ईंधन के विकल्प की तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं।

-प्रवीण कुमार, क्षेत्रीय अधिकारी-प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
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