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Noida News: सभी केंद्रों के ध्यानार्थ कला की अद्भुत तारकशी और जरी, लकड़ी से पत्थर तक कारीगरी

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कला की अद्भुत तारकशी और जरी, लकड़ी से पत्थर तक कारीगरी
- एक पांडाल में दिखे प्रदेश भर के विशेष उत्पाद
- बांदा के सजर स्टोन, मैनपुरी की तारकशी देखकर हैरत में पड़ गए दर्शक
जेपी शर्मा
ग्रेटर नोएडा। यूपी अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में एक जिला एक उत्पाद के स्टाल पर हस्तशिल्प की अद्भुत कारीगरी देखने को मिली। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के उत्पादों के अलावा हस्तशिल्पियों की कलाकारी देखने लायक थी। बनारस की साड़ी, गौतमबुद्ध नगर के रेडीमेड गारमेंट्स, बांदा के सजर स्टोन और शीशम की लकड़ी पर तारकशी देख दर्शक मंत्रमुग्ध हो गए। खास बात यह है कि हस्तशिल्प में महिलाएं भी बढ़चढ़कर हुनर दिखा रही हैं।

केन नदी से निकलती है फूल-पत्तियों की प्राकृतिक चित्रकारी
बांदा के हस्तशिल्पकार अर्जुन गुप्ता यहां नग जैसे दिखने वाले पत्थर की अंगूठियां और लॉकेट तराशते दिखे। उनसे अंगूठी में जड़े गए चित्रकारी से युक्त पत्थर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ये सजर पत्थर बांदा की केन नदी में पाया जाता है। दस पत्थर ढूंढने पर औसत एक पत्थर के बीच यह प्राकृतिक फूल पत्तियों की चित्रकारी देखने को मिलती है। पत्थर को तोड़ने के बाद इस चित्रकारी को ढूंढा जाता है। जिस पत्थर में यह चित्रकारी होती है, उनका इस्तेमाल हस्तशिल्पी काट छांटकर अंगूठी, लॉकेट समेत अन्य आभूषण बनाने में करते हैं। म
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मैनपुरी की सौ साल पुरानी तारकशी कला ने मोहा मन
मैनपुरी की तारकशी कला का भी खूबसूरत प्रदर्शन यहां देखने को मिला। मैनपुरी की मोहिनी ने बताया कि ये उनके जिले की लगभग सौ साल पुरानी कला है। पहले उनके जिले का एक परिवार ही इस कला को करता था लेकिन अब सरकार के बढ़ावा देने के कारण अन्य लोग भी इसमें हाथ आजमा रहे हैं। मोहिनी लगभग छह साल से अपने भाई शिवम के साथ यह कार्य कर रही हैं। वह बताती हैं कि शीशम की लकड़ी पर पहले एक चित्र बनाया जाता है। इसके बाद एक विशेष कागज रखकर इसमें पीतल, तांबा व कांसे का तार हथौड़ी से ठोककर चित्र तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे रेगमार से घिसकर चिकना किया जाता है, जिससे हाथ लगाने पर ये चोट न पहुंचाए।
बनारसी साड़ी की खूबसूरती के पीछे हैं कड़ी मेहनत
टैक्सटाइल से पीएचडी करने वाली अंगिका कुशवाहा स्टाल पर बनारसी साड़ी तैयार करती दिखाई दीं। हैंडलूम मशीन पर पर काम कर रहीं अंगिका बताती हैं कि पहले उनके पिता अमरेश कुशवाहा यह काम करते थे, अब वह एमबीए कर चुके भाई अक्षय के साथ इस काम को बड़े स्तर पर कर रही हैं। उनके पास 300 हैंडलूम मशीन हैं और 800 कारीगर काम करते हैं। उन्होंने बताया कि बनारसी साड़ी जितनी खूबसूरत है और इसका जितना नाम है, इसे बनाने में कारीगर को उतना ही पसीना बहाना पड़ता है। सिल्वर और गोल्ड एक-एक धागे को जोड़कर साड़ी तैयार की जाती है।
मथुरा के ठाकुर जी की पोशाक समेत यह उत्पाद भी नजर आए
एक जिला एक उत्पाद के स्टाल पर मथुरा के ठाकुर जी की पोशाक, खुर्जा की पॉटरी, अलीगढ़ का ताला, गोरखपुर का टेराकोटा, अमरोहा के म्यूजिकल उपकरण, मुरादाबाद का मेटल क्राफ़्ट, अमेठी का मूंज उत्पाद, गाजियाबाद का इंजीनियरिंग गुड्स, सुल्तानपुर के मूंज प्रोडक्ट्स, कुशीनगर का बनाना फाइबर उत्पाद आदि नजर आए।
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लखनऊ की जरी और जरदोजी

स्टाल में लखनऊ की नजमून निशा जरी और जरीदोजी की कढ़ाई करती दिखीं। उन्होंने बताया कि लखनऊ में बड़ी संख्या में हस्तशिल्प जरी जरदोजी का काम कर रहे हैं। इस कला को देश व विदेश के ग्राहकों के सामने लाने के लिए वह यहां पहुंची हैं।
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