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काव्य कैफे की डिजिटल महफिल में दुनिया के राग-रंग

Mon, 12 Jul 2021 06:36 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नोएडा

सार

डिजिटल माध्यम से किए इस आयोजन में प्रतिष्ठित कवि और शायरों ने हिस्सा लिया।
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काव्य कैफे - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अमर उजाला काव्य कैफे की एक और महफिल शनिवार शाम आयोजित की गयी। डिजिटल माध्यम से किए इस आयोजन में प्रतिष्ठित कवि और शायरों ने हिस्सा लिया। इसमें बेंगलूरू से शृंगार रस के युवा कवि मौसम कुमरावत के साथ ही जितेंद्र तिवारी, मुंतजिर फिरोजाबादी, अनूप काहिल और आशुतोष शर्मा अजल ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मुग्ध किया।

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मौसम कुमरावत- ने कोरोना काल की त्रासदी को कविता में ढालकर तरन्नुम में इस तरह प्रस्तुत किया-
एक हवा फैली ऐसी कि सारा जग ही ठहर गया,
लाशों का है जमघट, मरघट में बदल अब शहर गया।
इस सकल विश्व में हम सभी प्रार्थी हैं
अपने जीवन के रथ के स्वयं सारथी हैं
जाने कब चल पड़ें हम संसार को
हम जगत में तो हम सब शरणार्थी हैं।

जितेंद्र तिवारी- ग्वालियर निवासी और बेंगलूरू की आईटी फर्म में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर कार्यरत रचनाकार ने गजल से शुरुआत की-
अपने बारे में काफी कम लिखता हूं
मैं ज्यादातर औरों के गम लिखता हूं
सुकून आंखों में बातों में अदब रखता हूं
स्याह दिल वालों से मिलने में झिझक रखता हूं
धुएं को धुआं लिखता हूं, भाप को भाप लिखता हूं
मेरी आदत है मैं हर बात साफ-साफ लिखता हूं

अनूप काहिल-- झांसी में जन्मे अनूप काहिल इंजीनियरंग कॉलेज में सहायक प्रोफेसर हैं लेकिन मिजाज से शायर हैं। उनके अशआर थे-
हिरन के सिर से पहले तीर खींचो
अगर चाहो तो फिर तस्वीर खींचो
दिल उकताने लगा है जिंदगी से
कोई इस ट्रेन की जंजीर खींचो
मिरे हाथों को अपने हाथ में लो
और अपने हू ब हू तकदीर खींचो

आशुतोष अजल- मधुबनी जिले से ताल्लुक रखने वाले शायर आशुतोष मिश्र अजल  ने अपने अशआर इस तरह पेश किए-
कर जरा और इजाफा मिरी हैरानी में
मेरी तस्वीर बना बहते हुए पानी में
वो शब-ए-वस्ल चरागों को बुझा कर बोले
रौशनी है कहां दरकार बदन-ख्वानी में
देख कर चांद को हर रात यही सोचता हूं
चाक पर छोड़ गया कौन इसे बे-ध्यानी में

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