हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र गढ़ी कैंट में चल रहे निनाद महोत्सव में छठवें दिन हिमालय की विविध लोक संस्कृतियों की झलक देखने को मिली। दिनभर पारंपरिक लोकनृत्य, शास्त्रीय संगीत और संस्कृति संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों ने समारोह को ऐतिहासिक बना दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ डोईवाला के विधायक ब्रजभूषण गैरोला ने दीप प्रज्वलित कर किया। जनजाति क्षेत्र विकास समिति, कथियान डांगूठा त्यूणी के कलाकारों ने जौनसारी हारुल नृत्य कर दर्शकों का मन मोह लिया। पारंपरिक पोशाक, फरसे और लोकगाथाओं के गायन ने मंच को लोक संस्कृति की ऊर्जा से भर दिया। इसके बाद लद्दाख के कलाकारों ने राजसी शोंडोल नृत्य प्रस्तुत किया। लद्दाखी परंपरागत पोशाक गोंचा और पेरक सिरपोश में सजे कलाकारों ने बौद्ध संस्कृति और लोक परंपरा की झलक पेश की। सुभारती इंस्टीट्यूट देहरादून के कलाकारों ने रामचरित मानस का गायन किया। गंधर्व महाविद्यालय करनपुर के विद्यार्थियों ने मराठी, राजस्थानी और शास्त्रीय नृत्यों की प्रस्तुतियां दीं। दूसरे सत्र में नंदा देवी राजजात हिमालयी महाकुंभ विषय पर परिचर्चा हुई। जागर गायिका पद्मश्री बसंती बिष्ट ने जागर गायन से सत्र की शुरुआत की। डॉ. डीआर पुरोहित, भुवन नौटियाल और केडी सिंह ने राजजात के इतिहास, आयोजन और बदलते स्वरूप पर विचार रखे। संवाद